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Panipat News: मौत के पहियों के बीच से निकलती है समालखा की आधा दर्जन कॉलोनियां, प्रशासन ने फेरा मुंह

GGaganpreet Kaur
पानीपत न्यूज़: मौत के पहियों के बीच से निकलती है समालखा की आधा दर्जन कॉलोनियां, प्रशासन ने फेरा मुंह
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पानीपत । पानीपत के समालखा नगर परिषद में रहने वाले करीब 10 हजार लोगों के लिए ‘अमृत काल’ की रफ्तार किसी अभिशाप से कम नहीं है। विडंबना देखिए कि जिस देश में हाई-स्पीड ट्रेनों की बात हो रही है, वहां राजीव कॉलोनी और हनुमान बस्ती के बच्चे और बुजुर्ग आज भी स्टेशन पर खड़ी मालगाड़ियों के नीचे से रेंगकर स्कूल और बाजार जाने को मजबूर हैं। रेलवे लाइन के पार बसी आधा दर्जन कॉलोनियों के लिए एक अदद फुट ओवरब्रिज (FOB) का न होना अब केवल असुविधा नहीं, बल्कि हर रोज होने वाला जानलेवा जुआ बन गया है।

मालगाड़ी के नीचे से निकलता ‘बचपन’ और ‘बुढ़ापा’

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वार्ड नंबर 16 और 17 के अंतर्गत आने वाली राजीव कॉलोनी, हनुमान बस्ती, राजस्थान कॉलोनी, शिव कॉलोनी और भरत कॉलोनी के निवासियों का बाहरी दुनिया से संपर्क केवल रेलवे ट्रैक ही जोड़ता है। स्थानीय निवासी रमेश सैनी ने व्यवस्था पर तंज कसते हुए बताया कि प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर अक्सर घंटों तक लंबी मालगाड़ियां खड़ी रहती हैं। रमेश कहते हैं, “हमें राशन लेना हो या बच्चों को स्कूल छोड़ना हो, अगर मालगाड़ी खड़ी है तो या तो दो-तीन किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाओ या फिर जान हथेली पर रखकर बोगियों के नीचे से निकलो। महिलाओं को साड़ियां संभालते हुए पहियों के बीच से गुजरते देखना रूह कंपा देता है। अगर उस वक्त ट्रेन हिल भी गई, तो सीधा मौत तय है।”

अंतिम सफर भी आसान नहीं: शव लेकर करना पड़ता है इंतजार

कॉलोनीवासियों का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। राजेश, सोनू और विकास जैसे युवाओं ने बताया कि इस समस्या ने सामाजिक मर्यादाओं को भी ठेस पहुँचाई है। उन्होंने बताया कि यदि किसी के घर में मृत्यु हो जाती है, तो शव यात्रा को श्मशान घाट तक ले जाने के लिए ट्रैक ही मुख्य रास्ता है। कई बार मालगाड़ी खड़ी होने के कारण अंतिम विदाई के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ता है। मजबूरन, कई बार तो शव को मालगाड़ी के नीचे से या बोगियों के बीच से पार कराना पड़ता है, जो न केवल खतरनाक है बल्कि मानवीय संवेदनाओं का अपमान भी है।

फाइलों में दबा ओवरब्रिज, कब जागेगी सरकार?

कॉलोनीवासियों का कहना है कि वे केंद्र से लेकर हरियाणा सरकार और रेल मंत्रालय के दरवाजे खटखटा कर थक चुके हैं। हर चुनाव में ओवरब्रिज का वादा तो किया जाता है, लेकिन वोट डलते ही वह फाइलों के ढेर में कहीं गुम हो जाता है। अभिभावकों को हर समय यह डर सताता रहता है कि उनके बच्चे घर लौटते समय ट्रैक पर किसी हादसे का शिकार न हो जाएं। समालखा के इन बाशिंदों ने एक बार फिर सरकार और रेलवे प्रशासन से गुहार लगाई है कि उनकी जान की कीमत समझी जाए और तत्काल एक ओवरब्रिज का निर्माण कराया जाए, ताकि उन्हें ट्रेनों के पहियों के नीचे से रेंगकर अपनी मंजिल तक न पहुँचना पड़े।

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