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Train Wheels Without Nuts Bolts: बिना नट-बोल्ट के कैसे सुरक्षित रहता है ट्रेन का सफर, जानें 19वीं सदी से इस्तेमाल हो रही इस अनोखी तकनीक का राज

GGaganpreet Kaur
बिना नट-बोल्ट के कैसे सुरक्षित रहता है ट्रेन का सफर, जानें 19वीं सदी से इस्तेमाल हो रही इस अनोखी तकनीक का राज
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 बचपन से ही हम सब ट्रेन की छुक-छुक और उसकी रफ्तार के दीवाने रहे हैं। लेकिन क्या कभी आपने प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर ट्रेन के पहियों को गौर से देखा है? अगर देखा होगा, तो एक बात ने आपको जरूर हैरान किया होगा कि इतने विशालकाय पहियों में कहीं भी कोई नट-बोल्ट या वेल्डिंग का जोड़ नजर नहीं आता। सामान्य तौर पर एक छोटे से दोपहिया वाहन या कार के पहिए को भी चार-पांच बोल्ट्स के सहारे कसा जाता है, तो फिर सैकड़ों यात्रियों और हजारों टन लोहे का बोझ लेकर 100 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से दौड़ने वाली ट्रेन के पहिए आखिर धुरी से कैसे चिपके रहते हैं? जवाब छिपा है धातु विज्ञान (Metallurgy) और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के एक बेहद साधारण, लेकिन अचूक नियम में।

‘इंटरफेरेंस फिट’ का गणित: जब छेद छोटा और रॉड मोटी हो

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इस पूरी इंजीनियरिंग के जादू को समझने के लिए हमें इसके निर्माण की प्रक्रिया को देखना होगा। ट्रेन का पहिया और वह रॉड जिस पर दोनों पहिए टिके होते हैं (जिसे तकनीकी भाषा में एक्सल या धुरी कहते हैं), कभी भी एक साथ ढालकर नहीं बनाए जाते। दोनों को अलग-अलग फैक्ट्रियों में बेहद शुद्ध स्टील से तैयार किया जाता है।

अब खेल शुरू होता है साइज का। एक्सल का जो सिरा पहिए के अंदर जाना होता है, उसका व्यास (Diameter) पहिए के बीच में बने छेद के मुकाबले कुछ मिलीमीटर बड़ा रखा जाता है। सीधे तौर पर देखें तो छोटी जगह में बड़ी चीज को डालना नामुमकिन लगता है, लेकिन यहीं पर काम आती है ‘इंटरफेरेंस फिट’ या ‘प्रेस फिट’ तकनीक।

गर्मी और हजारों टन दबाव का खेल

इन दोनों को आपस में जोड़ने के लिए दो तरीके अपनाए जाते हैं। पहला तरीका है ‘थर्मल एक्सपेंशन’ यानी तापमान का खेल। पहिए के मध्य भाग को बहुत तेज आंच पर गर्म किया जाता है। विज्ञान का नियम है कि गर्म होने पर लोहा फैलता है। जैसे ही गर्म होने पर पहिए का छेद थोड़ा बड़ा होता है, एक्सल को उसके अंदर डाल दिया जाता है। इसके बाद जैसे ही पहिया धीरे-धीरे ठंडा होता है, स्टील अपनी पुरानी अवस्था में आने के लिए सिकुड़ता है। इस सिकुड़न के कारण वह एक्सल को इतनी मजबूती से जकड़ लेता है कि दोनों एक सिंगल पीस बन जाते हैं। दूसरे तरीके में विशालकाय हाइड्रॉलिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो बिना गर्म किए ही हजारों टन का दबाव डालकर पहिए को एक्सल के अंदर धकेल देती हैं। इस जोड़ में घर्षण (Friction) इतना ज्यादा होता है कि भारी से भारी कंपन या शॉक एब्जॉर्प्शन भी इस ग्रिप को ढीला नहीं कर सकता।

19वीं सदी से आज की बुलेट ट्रेन तक का सफर

ट्रेन का यह व्हीलसेट इस तरह काम करता है कि दोनों पहिए और एक्सल एक साथ ही घूमते हैं, जिससे ट्रेन का संतुलन पटरी पर कभी नहीं बिगड़ता। एक्सल के दोनों कोनों पर रोलर बेयरिंग लगे होते हैं, जो बोगी के वजन को पहियों पर ट्रांसफर करते हैं।

यह तकनीक कोई आज की नहीं है, बल्कि 19वीं सदी की शुरुआती रेलवे से लेकर आज की अत्याधुनिक हाई-स्पीड बुलेट ट्रेनों में भी इसी बुनियादी सिद्धांत का उपयोग हो रहा है। बस समय के साथ इसकी गुणवत्ता और सटीकता को बेहतर किया गया है। रेलवे सुरक्षा के लिहाज से इन पहियों की नियमित जांच होती है। इसके लिए ‘अल्ट्रासोनिक क्रैक डिटेक्शन’ मशीनों का उपयोग किया जाता है, जो धातु के अंदरूनी हिस्सों में आए सूक्ष्म से सूक्ष्म गैप को भी पकड़ लेती हैं। तो अगली बार जब आप ट्रेन में सफर करें, तो बिना नट-बोल्ट के घूमते इन पहियों को देखकर भारतीय इंजीनियरिंग के इस शानदार विज्ञान को जरूर याद कीजिएगा।

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