सिरसा। हरियाणा में आम तौर पर किसान गेहूं, धान और कपास जैसी पारंपरिक फसलों के मोहपाश में बंधे रहते हैं, लेकिन सिरसा जिले के रसूलपुर गांव के किसान केसर चंद ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। सिंचाई विभाग से सब-डिविजनल क्लर्क के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद केसर चंद ने खेती की जमीन पर नए प्रयोग करने की ठानी। उन्होंने कांट्रैक्ट फार्मिंग और ओपन मार्केट की ताकतों को समझा और आज वह फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) के जरिए आम फसलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा कूट रहे हैं। इस सफलता में उनकी पत्नी बागा रानी, बेटा हरनेक सिंह और बहू दर्शना रानी भी कंधे से कंधा मिलाकर खेत में पसीना बहा रहे हैं।
डेढ़ एकड़ से ₹6 लाख का मुनाफा, खेत से ही उठ रही है फसल
केसर चंद ने इस बार प्रयोग के तौर पर अपनी डेढ़ एकड़ जमीन में औषधीय गुणों से भरपूर ड्रैगन फ्रूट की बागवानी की। नतीजा यह रहा कि पहली व्यावसायिक खेप में ही करीब 30 क्विंटल की बंपर पैदावार हुई, जिससे उन्हें लगभग 6 लाख रुपये की सीधी कमाई हुई है। बाजार में इस प्रीमियम फल की कीमत ₹250 प्रति किलो तक मिल रही है। इस खेती का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बड़े शहरों के आढ़ती और विक्रेता सीधे खेत पर आकर ही माल उठा लेते हैं। आज उनके खेत का ड्रैगन फ्रूट हरियाणा के अलावा पंजाब और राजस्थान की मंडियों की शान बन रहा है।
लहसुन, प्याज से लेकर अमरूद के बाग तक फैला साम्राज्य
केसर चंद की दूरदर्शिता सिर्फ एक फसल तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपने पूरे खेत को एक हाइब्रिड मॉडल में बदल दिया है। वर्तमान में वे 6 एकड़ में लहसुन, 3 एकड़ में प्याज, 4 कनाल में आलू, 1 एकड़ में बेबी कॉर्न और डेढ़ एकड़ में ड्रैगन फ्रूट की काश्त कर रहे हैं, इसके साथ ही उन्होंने अमरूद का बाग भी लगाया है। उनकी बहू दर्शना रानी बताती हैं कि जहां मौसम खराब होने पर गेहूं, सरसों या नरमा की फसल पूरी तरह तबाह हो जाती है, वहीं ड्रैगन फ्रूट जैसी फसलों पर कुदरत की बेरुखी का असर बेहद कम होता है। इसके फल को कोल्ड स्टोरेज में छह महीने से लेकर एक साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
समृद्धि की गवाही दे रहे हैं दो आलीशान मकान और गाड़ियां
हरियाणा में करीब 36 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है, जिसमें से बड़ा हिस्सा आज भी धान-गेहूं के पारंपरिक चक्र में फंसा है, जिससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। हालांकि, राज्य का उद्यान विभाग बागवानी और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों पर 20 से 30 फीसदी तक का अनुदान देता है, जिसका सही लाभ केसर चंद जैसे प्रगतिशील किसानों ने उठाया है। आज उनके खेत में जैविक पद्धतियों का इस्तेमाल होता है। इस कृषि क्रांति का नतीजा है कि केसर चंद के पास आज दो बड़ी कोठियां, दो ट्रैक्टर, कंबाइन मशीन, कारें और आधुनिक कृषि यंत्र हैं, जो क्षेत्र में उनकी आर्थिक समृद्धि की गवाही दे रहे हैं।

