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Sakshar Bharat Mission: हिसार के सोंथा गांव ने रचा इतिहास: अंगूठे के निशान को पीछे छोड़ अब हर हाथ में है कलम, बना जिले का पहला पूर्ण साक्षर गांव

AAmandeep Singh
हिसार के सोंथा गांव ने रचा इतिहास: अंगूठे के निशान को पीछे छोड़ अब हर हाथ में है कलम, बना जिले का पहला पूर्ण साक्षर गांव
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हिसार। बदलते भारत की एक खूबसूरत और प्रेरणादायी तस्वीर हरियाणा के हिसार जिले से सामने आई है। जिले का सोंथा गांव अब केवल एक सामान्य गांव नहीं रहा, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में एक ‘लाइटहाउस’ बन गया है। लगभग ढाई हजार की आबादी वाले इस गांव ने 100 फीसदी साक्षरता का वह मुकाम हासिल कर लिया है, जो बड़े-बड़े शहरों के लिए भी एक चुनौती होता है। सात साल पहले तक जहां आधे से ज्यादा बुजुर्ग बैंक के कागजों पर अंगूठा लगाते थे, आज वहां 90 साल के दादा-दादी भी गर्व से अपने हस्ताक्षर करते हैं।

80% से 100% तक का सफर: इच्छाशक्ति ने बदली गांव की तकदीर

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सोंथा गांव की यह यात्रा आसान नहीं थी। साल 2017-18 के आसपास गांव की साक्षरता दर लगभग 80 प्रतिशत थी। एक बड़ी आबादी ऐसी थी जो न तो ‘क ख ग’ जानती थी और न ही अपना नाम लिख सकती थी। सरकारी दफ्तरों या बैंकों में जाने पर इन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था।

लेकिन, ग्रामीणों की दृढ़ इच्छाशक्ति और पढ़ने-लिखने के जुनून ने इस तस्वीर को पूरी तरह पलट दिया। आज स्थिति यह है कि गांव का कोई भी व्यक्ति, चाहे वह नन्हा बच्चा हो या 90 साल का बुजुर्ग, अनपढ़ नहीं है।

उल्लास योजना और ‘डिजिटल’ क्रांति: जब व्हाट्सएप बना पाठशाला

इस गांव को साक्षर बनाने में भारत सरकार की ‘उल्लास’ (ULLAS) योजना ने मुख्य भूमिका निभाई, लेकिन इसे धरातल पर उतारने का तरीका बिल्कुल आधुनिक था।

व्हाट्सएप ग्रुप की ताकत: गांव के दो समर्पित वालंटियरों ने एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने 15 साल से लेकर 90 साल तक के ग्रामीणों को व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़ा। जो लोग पढ़ना नहीं जानते थे, उन्हें धीरे-धीरे अक्षरों की पहचान कराई गई। सूचनाओं के आदान-प्रदान के इस डिजिटल माध्यम ने ग्रामीणों में सीखने की ललक पैदा कर दी।

चौकीदार की मुनादी: तकनीक के साथ-साथ पारंपरिक तरीकों को भी नहीं भुलाया गया। गांव के चौकीदार ने गली-गली, चौपालों और मंदिरों में मुनादी (घोषणा) कर लोगों को शिक्षा के महत्व और उल्लास योजना के फायदों के बारे में जागरूक किया।

डोर-टू-डोर सर्वे और जुनून: शिक्षा विभाग को सौंपा ‘विजय पत्र’

शिक्षा विभाग की टीम और गांव के युवाओं ने मिलकर एक व्यापक डोर-टू-डोर सर्वे किया। इस मुहिम के तहत हर उस व्यक्ति की पहचान की गई जो साक्षर नहीं था। इसके बाद नियमित रूप से कक्षाएं लगाई गईं। बुजुर्गों को उनके घर पर ही अक्षर ज्ञान दिया गया।

मुहिम की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव के लोगों ने खुद एक लेटर पैड पर लिखकर शिक्षा विभाग को आधिकारिक तौर पर सौंप दिया है कि अब उनके गांव का हर एक सदस्य साक्षर है। यह किसी भी गांव के लिए स्वाभिमान का क्षण है कि अब वहां का कोई भी नागरिक ‘अंगूठा छाप’ नहीं कहलाएगा।

क्यों खास है यह उपलब्धि?

यह सफलता केवल साक्षरता के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। साक्षर होने से ग्रामीणों में आत्मविश्वास बढ़ा है। अब वे सरकारी योजनाओं को खुद पढ़ सकते हैं, बैंक ट्रांजैक्शन आसानी से कर सकते हैं और डिजिटल दुनिया से जुड़ गए हैं। सोंथा गांव ने यह साबित कर दिया है कि अगर समुदाय और प्रशासन एक साथ मिल जाएं, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।

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