देश का युवा इस वक्त सिर्फ सरकारी नौकरी की परीक्षा नहीं दे रहा, बल्कि वह जर्जर हो चुके पूरे प्रशासनिक सिस्टम से लड़ रहा है। एक तरफ मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET UG) को लेकर पूरे देश में आक्रोश थमा नहीं था कि अब कर्मचारी चयन आयोग की ‘एसएससी जीडी’ (SSC GD) परीक्षा में बड़ी धांधली और मिसमैनेजमेंट की तस्वीरें सामने आने लगी हैं। 25 हजार पदों के लिए 27 अप्रैल से 30 मई 2026 तक चलने वाली इस परीक्षा के तहत देश के कई केंद्रों पर ऐसी लापरवाही बरती गई, जिसने ईमानदार छात्रों के भविष्य को अधर में लटका दिया है।
कंप्यूटर 650 और बुलाए 1035 छात्र, प्रयागराज में भड़का गुस्सा
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (अंदावा) स्थित परीक्षा केंद्र पर लापरवाही की सारी हदें पार हो गईं। यहाँ केंद्र पर महज 650 कंप्यूटर सिस्टम उपलब्ध थे, लेकिन आयोग और परीक्षा कराने वाली एजेंसी ने 1035 अभ्यर्थियों को एक ही शिफ्ट में अलॉट कर दिया। जब आधे से ज्यादा छात्रों को बैठने की जगह नहीं मिली तो युवाओं का सब्र टूट गया। परीक्षा केंद्र पर ही छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने कंप्यूटर, कुर्सियां, टेबल, एसी, कूलर और सीसीटीवी कैमरों को मलबे में तब्दील कर दिया। इसके अलावा मुजफ्फरनगर के बीबी कॉलेज केंद्र पर बिना किसी नोटिस के दूसरी व तीसरी शिफ्ट रद्द कर दी गई, वहीं गोरखपुर में रोल नंबर की गलत टैगिंग के कारण सैकड़ों छात्र परीक्षा से वंचित रह गए। बिहार में भी कई जगह पेपर कैंसिल करना पड़ा है।
बेंगलुरु की प्राइवेट कंपनी को ठेका, नोएडा-रांची में पकड़े गए सॉल्वर
इस पूरी परीक्षा को आयोजित कराने की जिम्मेदारी बेंगलुरु की एक प्राइवेट फर्म ‘एडूक्विटी कैरियर टेक्नोलॉजिस प्राइवेट लिमिटेड’ को दी गई थी, जिसकी कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में है। सरकारी दावों के उलट परीक्षा माफिया इस सिस्टम में सेंध लगा चुके हैं। नोएडा और रांची से पुलिस ने ऐसे सॉल्वर गिरफ्तार किए हैं जो 4-4 लाख रुपये लेकर मूल अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा दे रहे थे। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब करोड़ों रुपये का बजट प्राइवेट एजेंसियों को दिया जाता है, तो डिजिटल मॉनिटरिंग इतनी खोखली क्यों साबित हो रही है?
45 डिग्री की तपती धूप, जेब खाली और टूटा भरोसा
सोचिए, देश के कई हिस्सों में इस समय पारा 45 डिग्री के पार पहुंच चुका है। एक मध्यमवर्गीय परिवार का छात्र साल भर पेट काटकर, महंगे किराये और किताबों का बोझ उठाकर तैयारी करता है। वह सुबह 4 बजे घर से निकलता है, सैकड़ों किलोमीटर दूर ट्रेन और बसों के धक्के खाकर सेंटर पहुंचता है। लेकिन वहां जाकर उसे पता चलता है कि परीक्षा रद्द हो गई या सिटिंग अरेंजमेंट ही नहीं है। यह सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, बल्कि उस छात्र के भरोसे की हत्या है। जब बार-बार शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, नीट और एसएससी जैसी परीक्षाओं के पेपर लीक या कैंसिल होते हैं, तो युवाओं का पूरा करियर प्लान तबाह हो जाता है।
डिजिटल इंडिया में परीक्षा माफिया क्यों हैं हावी?
आज देश भले ही डिजिटल गवर्नेंस की बात करता हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि परीक्षा माफिया सरकारी तंत्र से ज्यादा मजबूत नजर आ रहे हैं। छात्रों की मांग अब बिल्कुल स्पष्ट और सख्त है—परीक्षाओं को महज एक ठेके की तरह न देखा जाए, बल्कि इसे राष्ट्रीय जिम्मेदारी माना जाए। जब तक पेपर लीक पर सख्त कानून जमीन पर लागू नहीं होगा और प्राइवेट वेंडर कंपनियों के साथ-साथ लापरवाह अधिकारियों पर सीधे जेल भेजने जैसी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक यह संकट दूर नहीं होने वाला। युवाओं के इस सब्र का बांध टूटने से पहले सिस्टम को जागाना होगा।

