Supreme Court Drug Case: सुप्रीम कोर्ट ने नशीली दवाओं के मामलों में जांच और कार्रवाई की प्राथमिकताओं पर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि ड्रग्स का इस्तेमाल करने वाले लोगों को केवल अपराधी मानकर उनके खिलाफ मुकदमा चलाने और उन्हें ट्रायल के दौरान जेल में रखने के बजाय नशीले पदार्थों की उपलब्धता रोकने और सप्लाई चेन तोड़ने पर ध्यान देना चाहिए। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने चेताया कि जेल में रहने के दौरान ऐसे लोग ड्रग्स के कारोबार से जुड़े लोगों के संपर्क में आ सकते हैं, जिससे वे इस नेटवर्क में और गहराई तक फंस सकते हैं।
यह टिप्पणी नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS एक्ट) के तहत एक महिला के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करते हुए की गई। महिला पर एक शिक्षण संस्थान के पास दो कथित विक्रेताओं से गांजे का पैकेट लेने का आरोप था। कोर्ट ने मामले के सबूतों पर विचार करने के बाद कहा कि इन परिस्थितियों में महिला के खिलाफ मुकदमा जारी रखने का कोई खास उद्देश्य नजर नहीं आता।
कोर्ट ने कहा- जेल में बने संपर्क पीड़ित को सप्लाई चेन में धकेल सकते हैं
सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि नशीली दवाओं का इस्तेमाल करने वाले हर व्यक्ति को केवल अपराधी के तौर पर देखने से समस्या और गंभीर हो सकती है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाने और ट्रायल से पहले उन्हें जेल में रखने से उलटा असर पड़ सकता है। जेल में उनकी मुलाकात ऐसे लोगों से हो सकती है जो उन्हें नशे के कारोबार से जोड़ दें या इस नेटवर्क में उनकी भूमिका बढ़ा दें।
कोर्ट ने जोर दिया कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को सिर्फ नशे का इस्तेमाल करने वालों को सजा देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कार्रवाई का प्रमुख लक्ष्य नशीले पदार्थों की उपलब्धता रोकना और उनकी सप्लाई करने वाले नेटवर्क को तोड़ना होना चाहिए। बेंच ने कहा कि इस्तेमाल करने वाले कई लोग खुद भी इस व्यवस्था के शिकार हो सकते हैं, इसलिए उनके मामलों में परिस्थितियों और उपलब्ध सबूतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
महिला के पास से नहीं मिला प्रतिबंधित पदार्थ, कोर्ट ने सबूतों पर उठाए सवाल
इस मामले में महिला पर एक शिक्षण संस्थान के पास दो कथित विक्रेताओं से गांजे का पैकेट लेने का आरोप लगाया गया था। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का मामला सह-आरोपी के बयान और महिला के कथित कबूलनामे पर आधारित था। महिला के पास से कोई प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं हुआ था। बेंच ने कहा कि इकबालिया बयान पर भरोसा करने के मामले में स्थापित कानूनी सिद्धांतों को ध्यान में रखना जरूरी है। कोर्ट ने उपलब्ध परिस्थितियों पर विचार करते हुए माना कि जब महिला के पास से प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं हुआ और मामला मुख्य रूप से बयानों पर आधारित था, तो उसके खिलाफ मुकदमा जारी रखने से कोई खास फायदा नहीं होगा।
कोर्ट ने ड्रग्स इस्तेमाल करने के आरोपियों को ट्रायल से पहले जेल में रखने के संभावित दुष्परिणामों पर भी चिंता जताई। बेंच के मुताबिक, जेल में बने संपर्क किसी व्यक्ति को नशीले पदार्थों की सप्लाई करने वाले नेटवर्क के और करीब ला सकते हैं। इसलिए नशे से जुड़े मामलों में कार्रवाई करते समय केवल इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को दंडित करने के बजाय सप्लाई और वितरण के नेटवर्क पर भी ध्यान देना चाहिए। इन्हीं तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महिला की अपील मंजूर कर ली और उसके खिलाफ चल रहे मुकदमे को रद्द कर दिया। कोर्ट की टिप्पणी में नशे के मामलों में कार्रवाई के दौरान सबूतों की मजबूती, आरोपी की भूमिका और सप्लाई चेन तोड़ने की जरूरत पर जोर दिया गया। पंजाब CM ऑफिस सीबीआई जांच मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टली, अब 9 अक्टूबर को होगी सुनवाई

