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आजादी के गुमनाम नायक: ग़दरी शहीद रहमत अली वजीदके की शहादत आज भी सरकारी ‘रहमत’ की प्रतीक्षा में

JJagmarg Desk
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बरनाला: भारत की आज़ादी का इतिहास अनगिनत कुर्बानियों की दास्तां है। पर इस इतिहास के कई अनमोल हीरे आज भी गुमनामी के अंधेरे में खोए हुए हैं। ऐसा ही एक महान नाम है ग़दरी शहीद रहमत अली वजीदके।

बरनाला जिले के गाँव वजीदके से संबंधित इस शूरवीर ने देश की खातिर हंसते हुए फांसी का फंदा चूमा। पर अफ़सोस की बात है कि आजादी के दशकों बाद भी न तो उनकी कोई राज्य स्तरीय यादगार बनी है और न ही किसी सरकार ने उनके पैतृक गाँव की सुध ली है।

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शहीद रहमत अली का जन्म बरनाला के गाँव वजीदके में हुआ। बेहतर भविष्य की तलाश में वह पहले कलकत्ता गए और फिर फिलीपींस (मनीला) चले गए। वहाँ उनका मेल ग़दर पार्टी के क्रांतिकारियों से हुआ। देशभक्ति का जज्बा इतना प्रबल था कि वह अपना सब कुछ त्याग कर ‘ग़दर अखबार’ की विचारधारा से जुड़ गए।

ऐतिहासिक दस्तावेज़ तस्दीक करते हैं कि रहमत अली ने ग़दर अखबार में 9 महत्वपूर्ण संपादकीय लिखे थे, जो उनकी बौद्धिकता और देश के प्रति समर्पण का सबूत हैं। उन्हें शहीद करतार सिंह सराभा, बाबा सोहन सिंह भकना और लाला हरदयाल जैसे महान योद्धाओं की नज़दीकी संगत हासिल थी।

जब ग़दर लहर के नेताओं ने भारत आकर ब्रिटिश सेना में बग़ावत करवाने की योजना बनाई, तो रहमत अली अग्रणी पंक्ति में थे। लुधियाना के बद्दोवाल में हुई गुप्त बैठक में उन्हें पूरे मालवा क्षेत्र की कमान सौंपी गई। उन्होंने फ़िरोज़पुर छावनी से हथियार लूटने की साहसिक योजना बनाई, पर किसी कारणवश यह सफल नहीं हो सकी।

इसके बाद हथियार खरीदने के लिए फंड इकट्ठा करने के मकसद से मोगा में सरकारी खजाना लूटने का प्लान बनाया गया। मोगा के पास मिश्री वाले पुल पर अंग्रेज़ पुलिस के साथ हुए मुकाबले के दौरान एक थानेदार और ज़ैलदार मारे गए, जिसके बाद रहमत अली और उनके 7 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया।

अदालती कार्यवाही और शहादत: काफ़िर आप हैं, हम नहीं

फ़िरोज़पुर की सेशन अदालत में चले मुकदमे के दौरान अंग्रेज़ हुकूमत के चाटुकार अधिकारियों ने रहमत अली पर धर्म के नाम पर दबाव डालने की कोशिश की। उनसे कहा गया कि वह मुसलमान होकर ‘काफ़िरों’ (हिंदू-सिख क्रांतिकारियों) का साथ दे रहे हैं।

पर खुद्दार योद्धा रहमत अली ने गरज कर जवाब दिया कि काफ़िर वे नहीं हैं जो मुल्क की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं, काफ़िर तो आप हैं जो चंद टुकड़ों के लिए अपना ईमान बेच रहे हैं। अंततः 25 मार्च 1915 को मिंटगुमरी जेल (पाकिस्तान) में उन्हें फांसी दे दी गई।

सरकारी बेरुखी, ग्रामीणों में रोष और मुख्य मांगें

हैरानी की बात है कि जिस शहीद ने देश की बुनियाद में अपना खून डाला, उनके पैतृक गाँव वजीदके को आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर शहीद की प्रतिमा लगाई है और एक स्थानीय क्लब भी बनाया है। हालाँकि, सरकारी हाई स्कूल का नाम शहीद रहमत अली के नाम पर है, पर गाँव की सड़कों, गंदे पानी की निकासी और शिक्षा के बुनियादी ढांचे की हालत बेहद खस्ता है।

गाँव के नेताओं पाली वजीदके और गुरजीत सिंह ने भारी मन से बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान मंचों पर तो रहमत अली का नाम लेते हैं, पर व्यावहारिक रूप में गाँव के लिए कोई ग्रांट या विशेष प्रोजेक्ट नहीं भेजा गया। उनकी मुख्य मांगें गाँव के स्कूल को 12वीं तक अपग्रेड किया जाए, वजीदके से हमीदी तक की सड़क को 18 फुट चौड़ा किया जाए, गांव में शहीद की याद में एक विशाल पुस्तकालय और यादगारी गेट बनाया जाए, शहीदी दिवस पर सरकारी तौर पर राज्य स्तरीय समारोह आयोजित किया जाए हैं।

विभाजन का दर्द और बिछड़ा परिवार

1947 के विभाजन के समय शहीद का परिवार पाकिस्तान चला गया था। शहीद के पोते आज भी पाकिस्तान के ज़िला लाहौर में बेहद गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जितना सम्मान शहीद भगत सिंह या करतार सिंह सराभा के परिवारों को मिला, रहमत अली का परिवार और गाँव उससे वंचित रहा है।

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