Chandigarh Cyber Crime: फोन की घंटी बजती है और दूसरी तरफ से आवाज आती है- आपके नाम का सिम कार्ड आतंकियों से जुड़ा है या आपके बैंक खाते का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। इसके बाद शुरू होता है गिरफ्तारी का डर दिखाने का खेल। खुद को पुलिस, सीबीआई या दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताने वाले साइबर ठग व्हाट्सऐप पर फर्जी गिरफ्तारी वारंट और सरकारी दस्तावेज भेजते हैं। वीडियो कॉल पर वर्दी और जांच का माहौल दिखाकर पीड़ित को इस कदर डरा देते हैं कि वह किसी से मदद मांगने के बजाय अपनी जीवनभर की जमा पूंजी उनके खातों में भेज देता है। डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का यह जाल अब बुजुर्गों को खास तौर पर निशाना बना रहा है। चंडीगढ़ में इस साल आठ महीने में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 5.41 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी हो चुकी है।
साइबर क्राइम सेल को एक जनवरी से 31 अगस्त 2026 तक ऐसी 27 शिकायतें मिलीं। इनके आधार पर पांच एफआईआर दर्ज की गईं। पुलिस के अनुसार, इन मामलों को सुलझा लिया गया है और कुछ आरोपितों को गिरफ्तार भी किया गया है। इसके बावजूद गिरोह के मुख्य सरगनाओं तक पहुंचना चुनौती बना हुआ है। हाल ही में चंडीगढ़ में डिजिटल अरेस्ट के तीन मामलों में साइबर ठगों ने कुल 2.93 करोड़ रुपये ठग लिए। पहला मामला 3 जून का है, जिसमें सेक्टर-47 निवासी सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी दंपती से 2.15 करोड़ रुपये ठगे गए। दूसरे मामले में 22 सितंबर को एक अन्य सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी से 29.80 लाख रुपये की ठगी हुई। वहीं, तीसरे मामले में सेक्टर-20 निवासी सेवानिवृत्त शिक्षिका को 16 और 17 सितंबर को पुलिस और एनआईए अधिकारी बनकर फोन किए गए। आरोपितों ने गिरफ्तारी का डर दिखाकर उनसे करीब 47.80 लाख रुपये ठग लिए।
पिछले साल भी डिजिटल अरेस्ट के 16 मामले सामने आए थे। इनमें 31 अगस्त 2025 तक करीब 10.37 करोड़ रुपये की ठगी हुई थी। रकम के आंकड़े बताते हैं कि ठगों का निशाना केवल बैंक खाते नहीं, बल्कि लोगों की वर्षों की बचत है। गिरफ्तारी और बदनामी के डर से पीड़ित कई बार ठगों के निर्देशों का पालन करते रहते हैं और उन्हें अपनी रकम गंवाने का एहसास तब होता है, जब खाते खाली हो चुके होते हैं। डिजिटल अरेस्ट के मामलों में 53 से 89 वर्ष तक के लोग शिकार बने हैं। इनमें 70 से 89 वर्ष की उम्र के कई बुजुर्ग शामिल हैं, जिनसे करोड़ों रुपये ऐंठे गए। कुछ मामलों में 80 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को तीन से चार करोड़ रुपये तक का नुकसान हुआ। जून 2026 में एक दंपति को गिरफ्तारी का डर दिखाकर 2.15 करोड़ रुपये विभिन्न बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए गए। वहीं, अगस्त में मनी लॉन्ड्रिंग और मानव तस्करी के मामले में फंसाने की धमकी देकर चंडीगढ़ की एक महिला से 9.51 लाख रुपये ठग लिए गए। इस मामले में पुलिस ने पश्चिम बंगाल के हावड़ा से राज कुमार शाह को गिरफ्तार किया था।
11 दिन डिजिटल अरेस्ट रख दंपती से ठगे दो करोड़
शहर में दो दिन पहले सेक्टर-38सी निवासी पब्लिक हेल्थ विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनकी पत्नी को साइबर ठगों ने 11 दिन तक डिजिटल अरेस्ट रखकर दो करोड़ रुपये ठग लिए। आरोपितों ने खुद को एंटी टेररिज्म स्क्वाड (एटीएस) का जांच अधिकारी बताया और दंपती को आतंकियों से संबंध होने के आरोप में गिरफ्तारी का डर दिखाया। ठगों ने दावा किया कि कश्मीर में पकड़े गए आतंकियों के पास दंपती के आधार और पैन कार्ड मिले हैं। इन दस्तावेजों से एचडीएफसी बैंक में खाता खोलकर आतंकियों को 70 लाख रुपये दिए गए। आरोपितों ने सुप्रीम कोर्ट से गिरफ्तारी वारंट जारी होने की बात कहकर दंपती को घर में रहने और बैंक खातों की पूरी रकम कथित तौर पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के खाते में ट्रांसफर करने को कहा। दंपती ने सेक्टर-17 स्थित साइबर क्राइम थाने में शिकायत देकर कार्रवाई और रकम वापस दिलाने की मांग की है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
वर्दी और फर्जी दस्तावेजों से रचते हैं गिरफ्तारी का नाटक
ठग पुलिस, सीबीआई, ईडी, आरबीआई, नारकोटिक्स या ट्राई का अधिकारी बनकर वीडियो कॉल करते हैं। पीड़ित को बताया जाता है कि वह किसी गंभीर अपराध की जांच के दायरे में है। इसके बाद फर्जी वारंट और दस्तावेज भेजकर गिरफ्तारी का डर बढ़ाया जाता है। कई बार पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार बने रहने, परिवार से बात नहीं करने और किसी को जानकारी नहीं देने की हिदायत दी जाती है। जांच, जमानत या गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर रकम मांगी जाती है। ठगों का मकसद पीड़ित को सोचने और किसी से सलाह लेने का मौका दिए बिना पैसे ट्रांसफर करवाना होता है। सरकारी एजेंसी का नाम और कानूनी कार्रवाई का डर इस धोखाधड़ी का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डरें नहीं, 1930 पर करें कॉल
चंडीगढ़ पुलिस ने एडवाइजरी जारी कर लोगों को ऐसे फोन कॉल से सतर्क रहने की सलाह दी है। पुलिस के मुताबिक, डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। पुलिस, सीबीआई या एनआईए वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती और न ही जांच के नाम पर पैसे जमा करवाती है। वीडियो कॉल पर वर्दी, पहचान पत्र या गिरफ्तारी वारंट देखकर भरोसा न करें, क्योंकि ठग फर्जी दस्तावेज दिखाकर लोगों को डराते हैं। मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला या आतंकी फंडिंग में नाम आने का डर दिखाकर पैसे ट्रांसफर करने को कहा जाए तो सतर्क रहें। कोई भी व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी का डर दिखाए और पैसे ट्रांसफर करने को कहे तो उसकी बातों में न आएं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि सिम कार्ड या दस्तावेज आतंकियों से जुड़े होने का दावा करने वाले कॉल पर घबराकर रकम न भेजें। फोन नंबर, व्हाट्सएप चैट, कॉल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन और स्क्रीनशॉट जैसे सबूत सुरक्षित रखें। संबंधित एजेंसी या नजदीकी पुलिस थाने से संपर्क कर अधिकारी की पहचान की पुष्टि करें। ओटीपी, बैंक खाते की जानकारी और निजी दस्तावेज किसी के साथ साझा न करें। साइबर ठगी होने पर तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं। CBI अफसर बनकर डराया, रिटायर SBI अधिकारी से 29.80 लाख ट्रांसफर कराए

