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Coal Gasification Scheme India: ऊर्जा संकट का अंत? ₹37,500 करोड़ की 'कोल गैसिफिकेशन' योजना से भारत बनेगा आत्मनिर्भर

GGaganpreet Kaur
ऊर्जा संकट का अंत? ₹37,500 करोड़ की 'कोल गैसिफिकेशन' योजना से भारत बनेगा आत्मनिर्भर
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नई दिल्ली (जग मार्ग)। भारत में ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) की परिभाषा बदलने वाली है। केंद्र सरकार अब कोयले को महज एक ‘ईंधन’ के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘संसाधन’ के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है। कोल इंडिया के पास मौजूद कोयले के विशाल भंडारों को अब ‘कोल गैसिफिकेशन’ तकनीक के जरिए सोने में बदलने की योजना है। इस मिशन को रफ्तार देने के लिए सरकार करीब ₹37,500 करोड़ से ₹40,000 करोड़ के बीच का एक वित्तीय प्रोत्साहन ढांचा तैयार कर चुकी है। इस योजना का सीधा फायदा उन कंपनियों को मिलेगा जो देश में गैसिफिकेशन प्लांट लगाएंगी।

क्या है यह तकनीक और क्यों है जरूरी?

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सरल शब्दों में कहें तो कोल गैसिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिसमें कोयले को चिमनियों में फूंकने के बजाय एक नियंत्रित वातावरण में रासायनिक प्रक्रिया के जरिए ‘सिंथेटिक गैस’ (सिंगैस) में बदला जाता है। यह गैस कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन और मीथेन का मिश्रण होती है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कोकिंग कोल, मेथेनॉल और यूरिया विदेशों से मंगवाता है। यदि हम अपने घरेलू कोयले से ये चीजें तैयार करने में सफल रहे, तो न केवल देश का पैसा बचेगा, बल्कि हम वैश्विक सप्लाई चेन के झटकों से भी सुरक्षित हो जाएंगे।

आयात बिल पर लगेगी लगाम

भारत हर साल उर्वरक (फर्टिलाइजर) और एलएनजी के आयात पर लाखों करोड़ रुपये खर्च करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संकटों के समय इन चीजों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। सरकार का मानना है कि यदि 2030 तक 100 मिलियन टन गैसिफिकेशन का लक्ष्य पूरा हो जाता है, तो स्टील इंडस्ट्री के लिए जरूरी कोकिंग कोल और खेतों के लिए यूरिया की आत्मनिर्भरता को नई दिशा मिलेगी। यह न केवल प्रदूषण कम करने की दिशा में एक कदम है (क्योंकि यह पारंपरिक दहन से कम उत्सर्जन करता है), बल्कि यह कोयले की उपयोगिता को भी कई गुना बढ़ा देता है।

चुनौतियां: लागत और पानी का बड़ा सवाल

हालांकि, यह सफर इतना आसान भी नहीं है। कोल गैसिफिकेशन प्लांट लगाना तकनीकी रूप से काफी जटिल है और इसमें बहुत अधिक निवेश की आवश्यकता होती है। यही वजह है कि सरकार ‘इन्सेंटिव’ के जरिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आकर्षित कर रही है। इसके अलावा, इस प्रक्रिया में पानी की खपत बहुत अधिक होती है, जो पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

भविष्य की ‘ऊर्जा रीढ़’ बनेगा कोयला

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कोयला भंडार है। नवीकरणीय ऊर्जा (Solar/Wind) पर बढ़ते जोर के बावजूद, कोयला आने वाले कई दशकों तक भारत की ऊर्जा जरूरतों का केंद्र बना रहेगा। ऐसे में उसे गैसिफिकेशन के जरिए हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स (जैसे मेथेनॉल और डीएमई) में बदलना देश को ‘एनर्जी संकट’ से हमेशा के लिए उबार सकता है। यदि कैबिनेट से इस प्रस्ताव को हरी झंडी मिल जाती है, तो यह भारतीय ऊर्जा बाजार के इतिहास में सबसे बड़े सुधारों में से एक होगा।

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