CPR Awareness Haryana: मौत को मात देने की वैज्ञानिक तकनीक, कौल अस्पताल में डॉक्टरों ने दी व्यावहारिक ट्रेनिंग
जिला परिषद अध्यक्ष कर्मबीर कौल ने प्राथमिक चिकित्सा को बताया सबसे बड़ा परोपकार, शिविर में उमड़ी भीड़
CPR Awareness Haryana: भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली और बढ़ते तनाव के बीच इन दिनों अचानक दिल की धड़कन रुकने (कार्डियक अरेस्ट) के मामले तेजी से बढ़े हैं। ऐसे आपातकालीन हालातों से निपटने और कीमती जानों को असमय काल के गाल में समाने से बचाने के लिए ढांड के कौल स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में एक बेहद सराहनीय कवायद की गई।
सुदेश भंडारी चैरिटेबल ट्रस्ट की अनूठी पहल पर मंगलवार को यहाँ ‘सीपीआर (कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन) जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम’ आयोजित किया गया। इस शिविर में न केवल स्वास्थ्य कर्मियों बल्कि आम ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और संकट के समय जीवनदाता बनने की वैज्ञानिक बारीकियों को समझा।
डमी मॉडल पर सिखाए हाथ के पैंतरे, कर्मबीर कौल ने थपथपाई पीठ
इस विशेष प्रशिक्षण शिविर में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे जिला परिषद के अध्यक्ष कर्मबीर कौल ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। उपस्थित जनसमूह को प्रेरित करते हुए कर्मबीर कौल ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि सड़क हादसों या अचानक दिल का दौरा पड़ने पर लोग अस्पताल ले जाने में वक्त गंवा देते हैं, जिससे मरीज की रास्ते में ही मौत हो जाती है।
ऐसे नाज़ुक वक्त में अगर मौके पर मौजूद किसी व्यक्ति को प्राथमिक उपचार की सही समझ हो, तो वह डॉक्टर के आने से पहले ही किसी का बुझता हुआ चिराग बचा सकता है। उन्होंने आह्वान किया कि इस शिविर से सीखे हुनर को लोग सिर्फ अपने तक सीमित न रखें, बल्कि इसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाएं।
शुरुआती चार मिनट तय करते हैं जिंदगी और मौत का फासला
जिला रेड क्रॉस सोसाइटी की ओर से बतौर सहयोगी पहुंचे कार्यक्रम समन्वयक डॉ. बलबीर सिंह ने कार्यशाला में बेहद सरल और व्यावहारिक तरीके से सीपीआर की महत्ता समझाई। उन्होंने वहां मौजूद लोगों को एक मेडिकल डमी (पुतले) पर हाथ की सही पोजीशन और छाती को दबाने (कंप्रेशन) की सटीक रफ्तार का लाइव डेमो करके दिखाया।
डॉ. बलबीर ने तकनीकी पक्ष साझा करते हुए बताया कि जब किसी इंसान का दिल अचानक काम करना बंद कर देता है, तो उसके बाद के शुरुआती चार से पांच मिनट सबसे संवेदनशील होते हैं। यदि इस स्वर्णिम समय (गोल्डन ऑवर) में मरीज के मस्तिष्क और शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बनाए रखने के लिए सही तरीके से छाती को पंप किया जाए, तो उसकी सांसें वापस लौटने की गुंजाइश 80 फीसदी तक बढ़ जाती है।
ग्रामीणों ने सराहा प्रयास, भविष्य में भी ऐसे शिविर लगाने की मांग
इस अनूठे प्रशिक्षण सत्र के समापन पर चिकित्सा अधिकारियों और ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने सभी प्रतिभागियों को जागरूक नागरिक की भूमिका निभाने का संकल्प दिलाया। कार्यक्रम में आए स्थानीय युवाओं और बुजुर्गों ने इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना की। ग्रामीणों का कहना था कि देहाती इलाकों में इस तरह की व्यावहारिक जानकारियां न होने के कारण अक्सर लोग अपनों को खो देते हैं।
प्रतिभागियों ने जिला प्रशासन और रेड क्रॉस सोसाइटी से मांग की कि ऐसे जीवनरक्षक शिविर उपमंडल के हर गांव और सरकारी स्कूल-कॉलेजों में नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए ताकि हर नागरिक संकट के समय एक कुशल मददगार की भूमिका निभा सके।
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