Retina Active After Death: मौत के 10 घंटे बाद भी जीवित रह सकती हैं आंखें, वैज्ञानिकों के नए प्रयोग से मची हलचल
आंखों की रोशनी लौटने की नई उम्मीद: स्पेन के वैज्ञानिकों ने खोजी तकनीक, 24 घंटे सुरक्षित रहेगी रेटिना
Retina Active After Death: चिकित्सा विज्ञान और जीव विज्ञान के क्षेत्र से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने मौत और जीवन की पारंपरिक परिभाषाओं को चुनौती दे दी है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा प्रयोग कर दिखाया है जो अब तक केवल कल्पनाओं या विज्ञान कथाओं का हिस्सा लगता था।
एक हालिया शोध में दावा किया गया है कि इंसान की मौत के 10 घंटे बाद भी उसकी आंखों का रेटिना प्रकाश की किरणों के प्रति बिल्कुल वैसे ही प्रतिक्रिया दे सकता है, जैसे किसी जीवित इंसान की आंख देती है। इस खोज ने न्यूरोलॉजिकल और ऑप्थैल्मिक रिसर्च के बंद पड़े कई रास्तों को एक झटके में खोल दिया है।
कैसे मुमकिन हुआ यह वैज्ञानिक चमत्कार?
हमारी आंखों के बिल्कुल पीछे रेटिना नाम की एक बेहद संवेदनशील परत होती है। इसका मुख्य कार्य प्रकाश को विद्युत संकेतों में बदलना है, जिन्हें हमारा मस्तिष्क एक छवि यानी तस्वीर के रूप में समझता है। मौत के तत्काल बाद जब शरीर में रक्त का प्रवाह थमता है, तो ऑक्सीजन के अभाव में रेटिना की कोशिकाएं भी दम तोड़ देती हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए स्पेन के ‘सेंटर फॉर जीनोमिक रेगुलेशन’ (CRG) के वैज्ञानिकों ने लैब के भीतर एक कृत्रिम ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम तैयार किया। इस सिस्टम के जरिए मृत घोषित हो चुके डोनर्स की आंखों की कोशिकाओं तक कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन और आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाए गए, जिसके बाद रेटिना ने रोशनी पड़ने पर सक्रिय सिग्नल्स भेजने शुरू कर दिए।
देखने की क्षमता और कोशिका के जिंदा रहने का अंतर
इस सनसनीखेज खोज के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मौत के बाद भी इंसान देख सकता है? वैज्ञानिकों ने इस पर बेहद स्पष्ट रुख अपनाया है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोशिकाओं का सक्रिय होना और किसी जीव का सचेत होकर देखना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। लैब में सक्रिय की गई रेटिना किसी जीवित मस्तिष्क से जुड़ी नहीं थी, इसलिए वहां कोई दृश्य या चेतना नहीं बन रही थी। यह केवल एक कोशिकीय स्तर की सक्रियता थी, जिसने यह साबित किया कि मौत के कई घंटों बाद भी आंखों के मुख्य हिस्से को कृत्रिम रूप से जीवित रखा जा सकता है।
अंधापन दूर करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम
यह खोज भविष्य में आंखों के इलाज की दिशा को पूरी तरह बदलने का दम रखती है। इस तकनीक की मदद से अब रेटिना की सजीव संरचना को करीब 24 घंटे तक प्रयोगशाला में सुरक्षित रखा जा सकेगा।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वैज्ञानिकों को अब आंखों की गंभीर बीमारियों, जैसे बढ़ती उम्र में होने वाला अंधापन (मैकुलर डीजनरेशन) और जेनेटिक रेटिनल विकारों पर शोध करने के लिए जानवरों के बजाय सीधे इंसानी रेटिना मिल सकेगी। इससे नई दवाओं का इंसानी आंखों पर सटीक असर देखना आसान हो जाएगा और आने वाले समय में आंखों के पूर्ण ट्रांसप्लांटेशन की जटिल गुत्थी को सुलझाने में भी मदद मिलेगी।
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