Nilokheri 1947 Partition Survivors: (महाबीर मैहला) अक्सर नई पीढ़ी देश के विभाजन के दर्द को सिर्फ इतिहास की किताबों या फिल्मों के जरिए ही महसूस कर पाती है। लेकिन नीलोखेड़ी के हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान के इंटर्न छात्रों ने इस बार इतिहास को बहुत करीब से जिया। संस्थान में ट्रेनिंग ले रहे छात्र-छात्राओं की एक टोली नीलोखेड़ी की गलियों में निकली और उन बुजुर्गों के दरवाजे खटखटाए, जिन्होंने अपनी आंखों से 1947 का वो खौफनाक मंजर देखा था जब एक लकीर ने उनके आशियाने छीन लिए थे।
इन युवाओं ने विभाजन की त्रासदी झेल चुके वरिष्ठ नागरिकों के साथ घंटों वक्त बिताया। बुजुर्गों ने भर्राई आवाज और नम आंखों से बताया कि कैसे रातों-रात उन्हें अपना सब कुछ छोड़कर अनजान राहों पर निकलना पड़ा था। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी और करनाल के दयाल सिंह कॉलेज से आए इन छात्रों ने बुजुर्गों के इन अनुभवों को बकायदा कैमरे और डायरी में रिकॉर्ड किया, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर हमेशा के लिए महफूज हो सके।
नीलोखेड़ी: तंबू नगरी से आदर्श टाउनशिप बनने की कहानी
इस शोध के दौरान छात्रों के सामने यह दिलचस्प तथ्य भी आया कि आज जिस नीलोखेड़ी को हम देख रहे हैं, वह दरअसल बंटवारे के बाद उजाड़े गए लोगों को फिर से बसाने की एक बेहद कामयाब और ऐतिहासिक कोशिश का नतीजा है। शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए इसे एक ‘मॉडल टाउन’ के रूप में तैयार किया गया था, जहां लोगों ने अपनी मेहनत और आत्मनिर्भरता के दम पर दोबारा अपनी तकदीर लिखी।
नीलोखेड़ी सिर्फ शहर नहीं, आत्मनिर्भरता की जिंदा मिसाल है: डॉ. चौहान
संस्थान के निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने इस मुहिम की सराहना करते हुए कहा, “नीलोखेड़ी महज ईंट-गारे से बना शहर नहीं है, बल्कि यह विपरीत परिस्थितियों में इंसानी जज्बे, पुनर्निर्माण और स्वावलंबन की एक जीती-जागती कहानी है। आज की युवा पीढ़ी के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे अपनी जड़ों को पहचानें और उन पूर्वजों के त्याग व संघर्ष को समझें, जिन्होंने शून्य से इस शहर को खड़ा किया है।”
‘नीलोखेड़ी उत्सव’ में दिखेगी ये ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री
डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने एक अहम जानकारी साझा करते हुए बताया कि इन बुजुर्गों के इंटरव्यू और जुटाए गए ऐतिहासिक तथ्यों को मिलाकर संस्थान एक बेहद खास डॉक्यूमेंट्री फिल्म तैयार कर रहा है। इस फिल्म का प्रीमियर आने वाले जुलाई महीने में आयोजित होने वाले भव्य “नीलोखेड़ी उत्सव” में किया जाएगा। इसका मकसद नई पीढ़ी को अपने स्थानीय इतिहास और बुजुर्गों के योगदान के प्रति संवेदनशील बनाना है।
इस पूरी शोध और फिल्म निर्माण की प्रक्रिया में रेखा, सोनू, मनीषा राणा, अर्पिता कुंडु और तनिष्का शर्मा जैसी होनहार छात्राओं ने मुख्य भूमिका निभाई। वहीं, संस्थान के जनसंपर्क अधिकारी (PRO) सौरभ अरोड़ा ने तकनीकी स्तर और सूचनाओं के तालमेल में पूरी टीम का मार्गदर्शन किया। छात्रों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट उनके लिए महज एक अकादमिक काम नहीं, बल्कि देश की विरासत को सम्मान देने का एक भावुक जरिया बन गया है।

