Nitesh Siwach Asian Games: कभी घर-घर बेचते थे दूध, आज एशियाई खेलों में नितेश सिवाच ने सिल्वर जीतकर रचा इतिहास
कभी घर-घर बेचते थे दूध, आज एशियाई खेलों में नितेश सिवाच ने सिल्वर जीतकर रचा इतिहास
Nitesh Siwach Asian Games: सोनीपत के छोटे से गांव जागसी से निकले पहलवान नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों में ग्रीको-रोमन कुश्ती के 97 किग्रा भारवर्ग में रजत पदक जीतकर स्वर्णिम इतिहास लिख दिया है। (Asian Games Greco Roman Wrestling) फाइनल मुकाबले में जापान के दमदार पहलवान यूरी नकाजातो से मिली करीबी हार के बावजूद नितेश ने वो कर दिखाया, जो बीते छः दशकों से कोई भारतीय पहलवान नहीं कर सका था। इससे पहले साल 1962 के जकार्ता एशियाड में दिग्गज गणपत अंदलकर ने 97+ किग्रा भारवर्ग में पदक हासिल किया था। 64 साल के इस लंबे इंतजार को खत्म कर नितेश ने न सिर्फ अपने गांव जागसी और पानीपत, बल्कि पूरे हरियाणा का मान एशियाड के मंच पर बढ़ाया है।
पिता का अधूरा सपना और 6 साल की उम्र में अखाड़े में कदम
नितेश के पिता आनंद सिवाच खुद भी पहलवानी के शौकीन थे, लेकिन आर्थिक तंगी और सही मार्गदर्शन न मिलने के कारण वह कभी अखाड़े में नहीं उतर सके। (Nitesh Siwach Sonipat Jagsi) इसी कसक को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने इकलौते बेटे नितेश को पहलवान बनाने की ठानी। साल 2008 में जब नितेश महज छह साल के थे, तभी से पिता उन्हें रोज सुबह-शाम गांव के अखाड़े ले जाने लगे। चार साल तक लगातार अभ्यास कराने के बाद वर्ष 2012 में खरखौदा के एक निजी स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ नितेश की पेशेवर कुश्ती का सफर शुरू हुआ।
घुटने की गंभीर चोट, बिस्तर पर बीता साल और दूध की केतली
सफलता के शिखर तक पहुंचने का यह रास्ता नितेश के लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा। साल 2014 में खरखौदा के प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान नितेश के घुटने में गंभीर चोट लग गई। (Haryana Wrestler Nitesh Siwach) डॉक्टरों को ऑपरेशन करना पड़ा और करीब एक साल तक नितेश पूरी तरह बिस्तर पर लाचार पड़े रहे। खेल छूटने का तनाव ऐसा था कि वह दिमागी रूप से टूटने लगे थे। बेटे को डिप्रेशन से बाहर निकालने के लिए पिता आनंद ने उन्हें पानीपत में अपने दूध के कारोबार में साथ लगा लिया।
3 एकड़ की बेहद मामूली खेती वाले इस परिवार ने नितेश की कुश्ती की खुराक और 15 हजार रुपये महीने के खर्च को पूरा करने के लिए जागसी गांव से पानीपत के सेक्टर-6 में आकर रहना शुरू किया था। चोट से उबरने के दौरान नितेश करीब एक साल तक सुबह उठकर पिता के साथ गांव से दूध लाते और पानीपत में घर-घर जाकर दूध बांटते रहे।
2017 में अखाड़े में वापसी और रेलवे पुलिस से एशियाई खेलों का सफर
दूध बेचने के दौरान भी नितेश के दिल में कुश्ती की आग सुलगती रही। एक दिन उन्होंने हिम्मत जुटाकर पिता से फिर से दांव-पेच आजमाने की इजाजत मांगी। (Indian Wrestling Asian Games) पिता के हरी झंडी देते ही 2017 में खरखौदा की प्राइवेट रेसलिंग अकादमी से नितेश ने दूसरी पारी शुरू की। पढ़ाई के मोर्चे पर 2025 और 2026 में ग्रेजुएशन में कंपार्टमेंट आने के बावजूद उन्होंने मैट पर अपना ध्यान भटकने नहीं दिया।
साल 2022 में नितेश को स्पोर्ट्स कोटे से रेलवे पुलिस में टीसी (Ticket Collector) की नौकरी मिल गई। सरकारी नौकरी से आर्थिक स्थिरता मिली तो उन्होंने पूरा फोकस एशियाई खेलों की तैयारियों पर झोंक दिया। संयुक्त परिवार के सहयोग और चचेरे भाइयों की प्रेरणा से नितेश ने एशियाई खेलों के फाइनल तक का सफर तय कर दिखाया।
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