Supreme Court online safety: सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। कोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट का इस्तेमाल हर व्यक्ति, यहां तक कि हर उम्र के बच्चे के लिए भी मौलिक अधिकार है। बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के साथ उनकी आजादी का ध्यान रखना भी जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट पर आपत्तिजनक सामग्री मौजूद होने के कारण बच्चों के लिए पूरे इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है। ऐसी पाबंदियों से बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने लग सकते हैं। ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से भी डर सकते हैं, जिससे उनकी सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित ऑनलाइन सामग्री (CSEAM) की पहचान करने और उसे हटाने की व्यवस्था मजबूत करने से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ये टिप्पणियां कीं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि किसी एक प्लेटफॉर्म से सामग्री हटाने भर से समस्या खत्म नहीं होती। वही तस्वीर या वीडियो दूसरे प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड किया जा सकता है। इसलिए ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए एक समन्वित व्यवस्था जरूरी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस तरह की सामग्री का नेशनल डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया है। साथ ही सोशल मीडिया कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि ऐसी सामग्री हटाने के दो घंटे के भीतर पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल को रिपोर्ट दें।
पांच साल में 26.6 गुना बढ़े बच्चों की अश्लील सामग्री से जुड़े मामले
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़ी चिंता NCRB के आंकड़ों से भी सामने आती है। गृह मंत्रालय की ओर से 29 जुलाई 2025 को लोकसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, बच्चों की अश्लील तस्वीरों और वीडियो से जुड़े मामले 2018 में 44 थे। 2022 में इनकी संख्या बढ़कर 1,171 हो गई। इस तरह पांच साल की अवधि में ऐसे मामलों की संख्या लगभग 26.6 गुना बढ़ी। बच्चों के खिलाफ दर्ज साइबर अपराध के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2018 में ऐसे 232 मामले सामने आए थे, जबकि 2022 में यह संख्या बढ़कर 1,823 हो गई। हालांकि, केंद्र सरकार ने 2022 के बाद के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। इसलिए उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इसके बाद की स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने डेटाबेस में दर्ज सामग्री की सही पहचान सुनिश्चित करने के लिए भी कई निर्देश दिए हैं। इसमें फोटो और वीडियो का डिजिटल हैश यानी उसकी पहचान करने वाला डिजिटल कोड और उस वेबसाइट का लिंक दर्ज किया जाएगा, जहां सामग्री मौजूद है। इससे एक जैसी सामग्री को अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड किए जाने पर पहचानने में मदद मिलेगी। डेटाबेस में किसी सामग्री को शामिल करने से पहले कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से उसकी जांच करेंगे। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित सामग्री वास्तव में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी है या नहीं। शुरुआती जांच में सॉफ्टवेयर की मदद भी ली जा सकती है।
सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का डेटाबेस से मिलान कर सकेंगी। इससे पहले हटाई जा चुकी सामग्री दोबारा अपलोड होने पर भी उसकी पहचान करने में मदद मिलेगी। कोर्ट ने डेटाबेस के इस्तेमाल में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जांच का रिकॉर्ड रखने, डेटाबेस तक पहुंच बनाने वालों की जानकारी दर्ज करने और समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट कराने की व्यवस्था करने को भी कहा है। गलत तरीके से दर्ज की गई सामग्री को हटाने और उसके खिलाफ शिकायत करने का तरीका भी तैयार करना होगा।
स्कूलों में बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचना सिखाया जाएगा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी व्यवस्था बनाना बच्चों को इंटरनेट पर सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सिखाना होगा कि ऑनलाइन खतरों को कैसे पहचाना जाए, अपनी निजी जानकारी को कैसे सुरक्षित रखा जाए और किसी गलत व्यवहार या शोषण का सामना होने पर मदद कैसे मांगी जाए। कोर्ट ने कहा कि बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से सहमति, स्वस्थ रिश्तों, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, ऑनलाइन शोषण तथा इसकी शिकायत करने के तरीकों की जानकारी दी जानी चाहिए। इससे बच्चों को संभावित खतरे पहचानने और समय रहते सहायता लेने में मदद मिल सकती है। इस दिशा में कोर्ट ने नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) और राज्यों की शैक्षिक संस्थाओं से पढ़ाई की सामग्री तैयार करने को कहा है।
इसके लिए बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की मदद लेने के निर्देश दिए गए हैं। यानी ऑनलाइन सुरक्षा को केवल अभिभावकों या तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी मानने के बजाय शिक्षा व्यवस्था के जरिए भी बच्चों को जागरूक करने पर जोर दिया गया है। कोर्ट ने पेड और सब्सक्रिप्शन आधारित वेबसाइटों तथा सेवाओं की भी सख्ती से जांच करने को कहा है। यह सुनिश्चित करना होगा कि इनके जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री या अन्य प्रतिबंधित कंटेंट न दिखाया जाए और न फैलाया जाए। केंद्र सरकार से यह विचार करने को भी कहा गया है कि ऐसी सामग्री से कमाई गई रकम जब्त करके वापस ली जा सकती है या नहीं। केंद्र सरकार को कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए जरूरी नियम और प्रक्रिया तय करनी होगी। जरूरत पड़ने पर सूचना प्रौद्योगिकी कानून और उससे जुड़े नियमों में बदलाव पर भी विचार करना होगा। सरकार को हलफनामा दाखिल कर बताना होगा कि इन निर्देशों को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।
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