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thought of the day: क्यों कुछ लोग मौकों को पहचानकर बाजी मार लेते हैं और कुछ चूक जाते हैं, जानिए सफलता का मूल मंत्र

GGaganpreet Kaur
क्यों कुछ लोग मौकों को पहचानकर बाजी मार लेते हैं और कुछ चूक जाते हैं, जानिए सफलता का मूल मंत्र
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Thought of the day: आमतौर पर नाकामयाबी का ठीकरा किस्मत पर फोड़ देना सबसे आसान बहाना होता है। हम अक्सर मान लेते हैं कि सफल होने वाले लोग सिर्फ भाग्यशाली थे। लेकिन अगर गहराई से पड़ताल की जाए, तो समझ आता है कि ‘भाग्य’ भी केवल उन्हीं का साथ देता है जो जोखिम उठाने का माद्दा रखते हैं। अवसर कभी सज-धजकर या ढोल-नगाड़ों के साथ नहीं आते; वे अक्सर चुनौतियों, कठिन परिस्थितियों या फिर बेहद साधारण सी दिखने वाली जिम्मेदारियों के रूप में हमारे सामने खड़े होते हैं। एक पारखी नजर और खुद पर अडिग विश्वास ही उस चुनौती के भीतर छिपे ‘गोल्डन चांस’ को पहचान सकता है।

जब डर थाम लेता है कदम

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मान लीजिए आपको एक नए शहर में नौकरी का प्रस्ताव मिलता है या फिर किसी ऐसे प्रोजेक्ट की कमान सौंपने की बात की जाती है जिसके बारे में आपको बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है। ऐसे मोड़ पर इंसानी जेहन में दो तरह के विचार आते हैं। पहला- “यह मेरे बस का नहीं है, अगर फेल हो गया तो थू-थू होगी।” दूसरा- “मुश्किल है, लेकिन मैं इसे सीखकर कर सकता हूं।”

पहला विचार आत्मविश्वास की कमी से पैदा होता है, जो सामने आए मौके का गला घोंट देता है। वहीं दूसरा विचार उस आत्म-विश्वास की गवाही देता है जो हारने के जोखिम को स्वीकार करते हुए भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इतिहास गवाह है कि दुनिया की तमाम बड़ी खोजें और कामयाबियां इसी दूसरे विचार की देन हैं।

आत्म-विश्वास की असली परिभाषा

अक्सर लोग आत्मविश्वास को ‘ओवर-कॉन्फिडेंस’ या अति-विश्वास समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि खुद पर भरोसे का मतलब है यह मान लेना कि हम कभी हार ही नहीं सकते। जबकि हकीकत इसके उलट है। सच्चा आत्मविश्वास यह नहीं कहता कि ‘मैं ही जीतूंगा’, बल्कि वह यह भरोसा देता है कि ‘अगर मैं हार भी गया, तो टूटूँगा नहीं, बल्कि सीखकर दोबारा खड़ा होऊंगा।’ यही लचीलापन (Resilience) इंसान को भीड़ से अलग करता है और उसे एक दिन लीडर की कतार में खड़ा कर देता है।

निष्कर्ष: जब दस्तक हो, तो दरवाजा खोलने को तैयार रहें

ज्या-पॉल सार्त्र ने कभी कहा था कि “इंसान अपनी पसंद का कुल जोड़ है।” जिंदगी में मौके सबको मिलते हैं—चाहे वह एक छात्र हो, एक व्यवसायी हो या फिर एक आम कामकाजी व्यक्ति। सवाल यह नहीं है कि आपको मौका मिला या नहीं, सवाल यह है कि जब समय ने आपका दरवाजा खटखटाया, तब क्या आप आत्म-संदेह की चादर ओढ़कर सो रहे थे या फिर अपनी काबिलियत के भरोसे दरवाजा खोलने के लिए तैयार खड़े थे?

इसलिए, बाहरी परिस्थितियों के बदलने या किसी बड़े चमत्कार का इंतजार करने से कई गुना बेहतर है कि हम खुद के भीतर के उस विश्वास को जगाएं जो किसी भी साधारण मौके को एक असाधारण सफलता की कहानी में तब्दील करने की ताकत रखता है।

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