ECI SIR Controversy: वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और न्यायिक प्रक्रिया पर विवाद तेज हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा ने मांग की है कि मई 2026 में SIR के फैसले को सही ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को वापस लिया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने अदालत के सामने तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़ी अहम जानकारी सामने नहीं रखी।
लाइव लॉ (LiveLaw) से बातचीत में जस्टिस गौड़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए। उन्होंने मांग की कि चुनाव आयोग से SIR शुरू करने से जुड़े सभी रिकॉर्ड मंगाए जाएं, ताकि यह पता चल सके कि फैसला पूरे आयोग ने लिया था या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद इसे आगे बढ़ाया। जस्टिस गौड़ा की यह मांग ऐसे समय आई है, जब SIR की प्रक्रिया, वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के नियमों और फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन विवादों का सीधा संबंध मतदाता सूची की विश्वसनीयता और नागरिकों के मतदान के अधिकार से है। एक बार इसे भी पढ़ लें; विपक्ष के विरोध के बीच 42 पूर्व जजों का SIR के समर्थन में देश के नाम ओपन लेटर
चुनाव आयोग के फैसले पर उठाए सवाल, सुप्रीम कोर्ट से रिकॉर्ड मंगाने की मांग
जस्टिस गोपाल गौड़ा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को यह जांचना चाहिए कि SIR कराने का फैसला चुनाव आयोग के पूरे आयोग यानी ‘फुल कमीशन’ की मंजूरी से लिया गया था या नहीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि निर्णय में सभी चुनाव आयुक्तों की सहमति शामिल थी या नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने सुनवाई के दौरान तथ्यों को गलत तरीके से पेश करके सुप्रीम कोर्ट को गुमराह किया। गौड़ा ने कहा, “SIR के फैसले में गैर-कानूनीपन और असंवैधानिकता साफ तौर पर दिखती है।” उनके मुताबिक, यदि अदालत के सामने महत्वपूर्ण तथ्य नहीं रखे गए, तो फैसले के आधार की दोबारा जांच जरूरी हो जाती है।
जस्टिस गौड़ा ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि SIR से जुड़े कई फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आगे बढ़ाए। गौड़ा का कहना है कि इस पहलू को सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं रखा गया था। उन्होंने दलील दी कि यदि किसी न्यायिक फैसले के दौरान जानबूझकर अहम तथ्य छिपाए गए हों, तो अदालत को उस मामले की समीक्षा करनी चाहिए। उनके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग के आंतरिक रिकॉर्ड मंगाकर यह देखना चाहिए कि SIR से जुड़ा निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया और क्या इसके लिए आयोग की आवश्यक मंजूरी मौजूद थी। हालांकि, जस्टिस गौड़ा के ये आरोप और मांग उनकी राय हैं। SIR पर दिए गए फैसले को वापस लेने या चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को अवैध घोषित करने का कोई नया आदेश इस बयान से अपने आप नहीं निकलता। इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और उसके आदेशों से ही तय होगी।
फॉर्म-6 विवाद में CJI की टिप्पणी का दिया हवाला
जस्टिस गौड़ा ने चुनाव आयोग की 26 सितंबर की प्रेस रिलीज पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि आयोग ने इस बयान के जरिए यह संकेत देने की कोशिश की थी कि SIR के दौरान इस्तेमाल किए गए संशोधित फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिली हुई है। उन्होंने इसे फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत से जुड़ा अहम पहलू बताया। फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम शामिल करने के लिए किया जाता है। इस फॉर्म के साथ SIR प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त घोषणा जोड़े जाने को लेकर विवाद हुआ। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने बदलाव पर आपत्ति जताई थी और नियमों में संशोधन के बिना ऐसा करने की वैधता पर सवाल उठाए थे।
5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 के किसी संशोधित संस्करण को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने यह भी कहा था कि रिकॉर्ड मिलने के बाद यह देखा जाएगा कि फॉर्म में बदलाव किसने किया। इस टिप्पणी ने चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज और फॉर्म में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों को और अहम बना दिया। जस्टिस गौड़ा ने इसी घटनाक्रम का हवाला देते हुए कहा कि SIR से जुड़े फैसले और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया की समीक्षा होनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि आयोग ने अदालत के सामने किसी बदलाव की स्थिति को गलत तरीके से पेश किया, तो यह जांच का विषय है। हालांकि, फॉर्म-6 को मंजूरी न दिए जाने संबंधी CJI की टिप्पणी और मई के SIR फैसले को वापस लेने की मांग दो अलग कानूनी पहलू हैं। SIR को लेकर विवाद इसलिए भी अहम है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम शामिल होने या हटने का असर नागरिकों के मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग के फैसलों की पारदर्शिता, नियमों का पालन और शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था में लोगों के भरोसे से जुड़ी है।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बचाव, पूर्व CJI गवई की आलोचना पर उठाए सवाल
जस्टिस गोपाल गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का भी बचाव किया। जस्टिस भुइयां ने बड़ी संख्या में मतदाताओं के मतदान के अधिकार पर असर पड़ने से जुड़े मुद्दे पर टिप्पणी की थी। इस टिप्पणी को लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने आलोचना की थी। गौड़ा ने कहा कि किसी संवैधानिक मुद्दे पर बोलना अपने आप में न्यायिक अनुचित आचरण नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि कानून के विद्यार्थियों से संवैधानिक अधिकारों के बारे में बात करने में क्या गलत है। उनके मुताबिक, न्यायाधीशों को संवैधानिक सिद्धांतों और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर चर्चा करने का अधिकार है। उन्होंने पूर्व CJI गवई की आलोचना पर भी सवाल उठाए। गौड़ा ने जज लोया मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि गवई ने बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीश रहते हुए उस मामले पर टिप्पणी की थी, जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन था। उन्होंने यह भी पूछा कि चुनाव आयोग के फैसलों पर अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से जुड़ी रिपोर्टों के बाद उठी चिंताओं पर जवाब क्यों नहीं दिया गया।
जस्टिस गौड़ा ने बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में आयोजित विरोध प्रदर्शन में भी हिस्सा लिया था। वहां उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के SIR संबंधी फैसले से असहमति जताई और इसे “असंवैधानिक, गैर-कानूनी और अलोकतांत्रिक” बताया। प्रदर्शन में मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर भी कड़ी टिप्पणी की और आरोप लगाया कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। SIR को लेकर चल रही बहस अब केवल मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है। इसमें चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था, फॉर्म-6 में बदलाव की वैधता, अदालत के सामने तथ्य रखने की जिम्मेदारी और मतदाताओं के अधिकार जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए हैं। जस्टिस गौड़ा ने सुप्रीम कोर्ट से इन सवालों की जांच कर फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

