Hariyali Teej: सावन का महीना आते ही चारों ओर कुदरत की खूबसूरती बिखरने लगती है। रिमझिम फुहारों के बीच इस महीने पड़ने वाले त्योहारों का अपना ही एक अलग सांस्कृतिक और धार्मिक मिजाज होता है।
इन्हीं में से एक बेहद खूबसूरत पर्व है ‘हरियाली तीज’, जो सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पूरे देश में आस्था और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार केवल एक व्रत या अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, प्रेम और अखंड सौभाग्य के उत्सव का प्रतीक है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी लड़कियां मनचाहा जीवनसाथी पाने की आस में मां गौरी की आराधना करती हैं।
हरियाली तीज के जिक्र के साथ ही आंखों के सामने हरे-भरे परिधान, हाथों में रची मेहंदी और कलाइयों में खनकती हरी चूड़ियों की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन हरे रंग का ही इतना विशेष महत्व क्यों है और क्यों महिलाएं इसी रंग में सराबोर नजर आती हैं?
प्रकृति की नवचेतना और खुशहाली का प्रतीक
‘हरियाली’ शब्द का सीधा अर्थ ही समृद्ध और हरा-भरा होना है। भीषण गर्मी के बाद सावन की पहली बारिश के साथ ही सूखी धरती फिर से जीवंत हो उठती है। पेड़-पौधों, जंगलों और खेतों में नई कोपलें फूटती हैं और चारों तरफ हरियाली की चादर बिछ जाती है। भारतीय संस्कृति में कुदरत के इस नए बदलाव को जीवन में मिलने वाले नए उत्साह से जोड़कर देखा जाता है। शास्त्रों में हरे रंग को वृद्धि, सकारात्मक ऊर्जा, अच्छी सेहत और तरक्की का सूचक माना गया है। ऐसे में महिलाएं प्रकृति के इस मनमोहक स्वरूप को अपने श्रृंगार में ढालकर ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करती हैं।
शिव-पार्वती के अटूट प्रेम और भक्ति का रंग
धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो हरा रंग भगवान शिव और माता पार्वती दोनों को ही अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि इसी पावन दिन माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था। सनातन परंपरा में हरे रंग को प्रेम, करुणा और सौहार्द की भावना से जोड़ा गया है। यही कारण है कि सुहागिन महिलाएं अपने दांपत्य जीवन में अनवरत प्रेम और मिठास बनाए रखने के लिए इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनती हैं और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
इसके अलावा, हरियाली तीज पर हरे रंग की चूड़ियां और रची हुई मेहंदी सोलह श्रृंगार का सबसे अहम हिस्सा मानी जाती हैं। गांवों और शहरों में आज भी इस दिन महिलाएं एक साथ इकट्ठा होकर लोकगीत गाती हैं, बागों में झूले झूलती हैं और उत्सव मनाती हैं। साफ है कि यह पर्व केवल धार्मिक मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान का कुदरत के साथ बने उस अनूठे और अटूट रिश्ते को भी याद दिलाता है जो सदियों से हमारी संस्कृति की पहचान रहा है।
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