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haryana-farmers-crop-payment-delay: फसल बेचकर भी खाली हाथ किसान: भाकियू ने सरकार की पेमेंट पॉलिसी को बताया 'अन्यायपूर्ण', सॉफ्टवेयर में बदलाव की मांग

GGaganpreet Kaur
फसल बेचकर भी खाली हाथ किसान: भाकियू ने सरकार की पेमेंट पॉलिसी को बताया 'अन्यायपूर्ण', सॉफ्टवेयर में बदलाव की मांग
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कुरुक्षेत्र (जग मार्ग)। हरियाणा की मंडियों में अपनी खून-पसीने की कमाई लेकर पहुंच रहे किसानों के लिए भुगतान की प्रक्रिया अब सिरदर्द बनती जा रही है। सरकार और प्रशासन भले ही दावा कर रहे हों कि फसल खरीद के 72 घंटों के भीतर पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंच रहा है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) ने अब इस मुद्दे पर सीधा मोर्चा खोलते हुए खाद्य एवं आपूर्ति निदेशक को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि यदि भुगतान प्रणाली में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो किसान सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।

सॉफ्टवेयर की ‘कंडीशन’ ने अटकाया पैसा

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यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने सरकार की खरीद नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान खरीद सॉफ्टवेयर (पोर्टल) में एक ऐसी तकनीकी शर्त लगा दी गई है, जो सीधे तौर पर किसानों का शोषण कर रही है। सिस्टम के मुताबिक, जब तक मंडी से फसल का उठान नहीं होता और आउटगोइंग गेट पास जारी नहीं होता, तब तक किसान की पेमेंट रिलीज नहीं की जाती। चढूनी ने कहा, “फसल का उठान आढ़तियों, सरकारी अधिकारियों और ट्रांसपोर्टर्स के बीच का तालमेल है। इसमें किसान की कोई भूमिका नहीं होती, फिर ट्रांसपोर्टर की देरी या लिफ्टिंग न होने की सजा किसान को क्यों दी जा रही है?”

15 से 20 दिनों का लंबा इंतजार

वहीं, यूनियन के प्रवक्ता राकेश कुमार बैंस ने बताया कि कई मंडियों में हालात इतने बदतर हैं कि किसानों को अपनी ही फसल के पैसे के लिए 15 से 20 दिनों तक सरकारी दफ्तरों और आढ़तियों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। बैंस के अनुसार, यह न केवल किसानों के साथ भेदभाव है, बल्कि आर्थिक रूप से उनकी कमर तोड़ने जैसा है। किसान को अगली फसल की तैयारी और घरेलू जरूरतों के लिए तत्काल नकदी की जरूरत होती है, लेकिन सॉफ्टवेयर की उलझनों में उसकी मेहनत की कमाई फंसी रहती है।

जे-फॉर्म कटते ही मिले पेमेंट, वरना होगा आंदोलन

भाकियू ने दोटूक शब्दों में मांग की है कि खरीद नीति में तुरंत संशोधन किया जाए। यूनियन का कहना है कि जैसे ही किसान की फसल की ढेरी बिकती है और उसका ‘जे-फॉर्म’ (J-Form) कट जाता है, उसी वक्त से 48 से 72 घंटे की समय सीमा शुरू होनी चाहिए। फसल मंडी से उठी है या नहीं, इसका भुगतान से कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए। किसान संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जल्द ही भुगतान के नियमों को सरल नहीं बनाया गया और किसानों के खातों में समय पर पैसा नहीं आया, तो प्रशासन बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहे।

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