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Human Rights and Democracy Forum Punjab : जसवंत खालड़ा के साथी जसपाल ढिल्लों ने फिर शुरू किया मानवाधिकार मंच, पंजाब में 37 फर्जी मुठभेड़ों का दावा

Human Rights and Democracy Forum Punjab : जसवंत खालड़ा के साथी जसपाल ढिल्लों ने फिर शुरू किया मानवाधिकार मंच, पंजाब में 37 फर्जी मुठभेड़ों का दावा

जसवंत खालड़ा के साथी जसपाल ढिल्लों ने फिर शुरू किया मानवाधिकार मंच, पंजाब में 37 फर्जी मुठभेड़ों का दावा

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hharpreet singh

Human Rights and Democracy Forum Punjab :  पंजाब के काले दौर में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जान गंवाने वाले जुझारू कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के सहयोगी रहे जसपाल सिंह ढिल्लों ने एक बार फिर से इस मुहिम को धार देने का फैसला किया है। चंडीगढ़ के सेक्टर-27 स्थित प्रेस क्लब में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेसवार्ता के दौरान उन्होंने ‘ह्यूमन राइट्स एंड डेमोक्रेसी फोरम’ (HRDF) को दोबारा से री-लांच करने की घोषणा की।

ढिल्लों ने साफ किया कि यह नया मंच पूरी तरह से गैर-पक्षपाती रूप से काम करेगा, जिसका मुख्य उद्देश्य जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी मदद मुहैया कराना, अधिकारों के हनन का पुख्ता रिकॉर्ड तैयार करना और संवैधानिक जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इस मौके पर उनके साथ फोरम के वाइस चेयरमैन गुरशेर सिंह, महासचिव राजविंदर सिंह और संगठन सचिव करमजीत सिंह भी प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

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डेढ़ साल में 37 कथित फर्जी मुठभेड़ों का सनसनीखेज दावा

प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए एचआरडीएफ के नवनियुक्त चेयरमैन जसपाल सिंह ढिल्लों ने एक बड़ा और गंभीर दावा करते हुए कहा कि पिछले डेढ़ साल के अंतराल में पंजाब के भीतर 37 कथित फर्जी मुठभेड़ें दर्ज की गई हैं।

उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में युवा और उनके पीड़ित परिवार लगातार उनके संपर्क में आ रहे हैं, जो गैर-कानूनी हिरासत, मनगढ़ंत आपराधिक मामलों, पुलिस कस्टडी में होने वाली हिंसा और उचित कानूनी प्रक्रिया से वंचित किए जाने जैसी गंभीर शिकायतें लेकर आ रहे हैं। फोरम इन्हीं तमाम मामलों की गहराई से दस्तावेजी दस्तावेज तैयार कर कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए सच्चाई सामने लाने का काम करेगा।

क्यों पड़ी इस फोरम की दोबारा जरूरत

हाल के दिनों में पंजाब के मानवाधिकार इतिहास पर छिड़ी सार्वजनिक चर्चाओं और उग्रवाद के दौर की अनकही कहानियों ने एक बार फिर लोगों को झकझोर कर रख दिया है। ढिल्लों ने इस बात का जिक्र किया कि कैसे इस दौर की घटनाओं को लेकर युवाओं और परिवारों के मन में नए सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि उन्होंने साल 1985 में ‘पंजाब ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन’ के साथ अपने मानवाधिकार सफर की शुरुआत की थी।

इसके बाद नब्बे के दशक में अकाली दल के ह्यूमन राइट्स विंग के तहत जसवंत सिंह खालड़ा के साथ मिलकर काम किया गया था। बाद में साल 1997 में एचआरडीएफ की नींव रखी गई थी, जिसे अब व्यक्तिगत कारणों से कुछ समय की सुस्ती के बाद एक बार फिर सक्रिय रूप से मैदान में उतारा गया है।

अज्ञात अंतिम संस्कारों के सबूत और न्याय की लंबी लड़ाई

खालड़ा के साथ मिलकर अतीत में किए गए संघर्षों को याद करते हुए ढिल्लों ने बताया कि उनके द्वारा जुटाए गए दस्तावेजों ने हजारों अज्ञात अंतिम संस्कारों की पोल खोली थी, जिससे बाद की न्यायिक जांचों का रास्ता साफ हुआ। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई द्वारा की गई जांच के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि उस वक्त सत्तर एफआईआर दर्ज हुई थीं, जिनमें से सबूतों के अभाव में बीस मामलों में क्लोजर रिपोर्ट लग गई।

इसके बावजूद उनहत्तर मामलों में सजा हुई और लगभग सौ पुलिसकर्मी दोषी करार दिए गए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका मकसद किसी संस्था को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि कानून के दायरे में रहकर हर गलत कृत्य के लिए जवाबदेही तय करवाना है।

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