Karwa Chauth: भारतीय संस्कृति में करवा चौथ के त्योहार का स्थान बेहद खास है। पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत सुहागिनों के लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता। साल 2026 में यह पावन पर्व 29 अक्टूबर (गुरुवार) को मनाया जाएगा। उत्तर भारत से लेकर देश के तमाम हिस्सों में इस दिन का उत्साह देखते ही बनता है। हाथों में सजी मेहंदी, सोलह श्रृंगार और मन में अटूट विश्वास के साथ महिलाएं इस दिन की तैयारी हफ्तों पहले शुरू कर देती हैं। हालांकि, जो बेटियां या बहुएं पहली बार इस कठिन व्रत का अनुभव करने जा रही हैं, उनके लिए इसकी सही विधि और परंपराओं को समझना बहुत जरूरी हो जाता है।
सरगी से होती है दिन की शुरुआत और पारंपरिक श्रृंगार का महत्व
करवा चौथ के दिन की शुरुआत सूरज की पहली किरण निकलने से काफी पहले ‘सरगी’ के साथ होती है। यह एक ऐसा नेग या भोजन है जिसे सास बड़े स्नेह के साथ अपनी बहू को देती हैं। इसमें ताजे फल, मिठाइयां और मेवे शामिल होते हैं, जिन्हें खाने से पूरे दिन बिना पानी और अन्न के रहने के लिए शरीर को जरूरी ऊर्जा मिलती है। इसके अलावा, इस दिन सजने-संवरने का भी खास विधान है। सुहागिनें आमतौर पर लाल, मैरून, गुलाबी या चमकीले नारंगी रंग के पारंपरिक कपड़े पहनती हैं, जिन्हें प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। माथे पर सिंदूर, हाथों में खनकती चूड़ियां, आभूषण और सोलह श्रृंगार इस पर्व की खनक को और बढ़ा देते हैं। वहीं, सनातन परंपरा में काले या सफेद रंग के वस्त्रों को इस दिन वर्जित माना गया है, इसलिए उत्सव के इन रंगों से दूरी ही रखनी चाहिए।
सेहत सबसे पहले, धर्म और आस्था का यह है असली संदेश
श्रद्धा और उपवास अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सनातन धर्म भी कभी यह नहीं सिखाता कि आप अपनी सेहत को दांव पर लगाएं। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है—’शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’, जिसका सीधा अर्थ है कि किसी भी धार्मिक कार्य या अनुष्ठान को पूरा करने के लिए एक स्वस्थ शरीर का होना सबसे पहली शर्त है। यदि आप किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही हैं, शुगर या ब्लड प्रेशर की मरीज हैं, अथवा गर्भ से हैं, तो कठोर निर्जला व्रत रखने से पहले अपने चिकित्सक या किसी योग्य विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। भगवान कभी नहीं चाहते कि आप खुद को शारीरिक कष्ट देकर उनकी आराधना करें। आपकी सच्ची निष्ठा और आस्था ही पूजा का सबसे बड़ा आधार है, इसलिए अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही इस व्रत को निभाएं।
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