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Kaushiki Amavasya 2026: 10 या 11 सितंबर? जानिए कब है कौशिकी अमावस्या और तारापीठ की महापूजा

Kaushiki Amavasya 2026: 10 या 11 सितंबर? जानिए कब है कौशिकी अमावस्या और तारापीठ की महापूजा

10 या 11 सितंबर? जानिए कब है कौशिकी अमावस्या और तारापीठ की महापूजा

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AAmandeep Singh

Kaushiki Amavasya 2026: हिंदू धर्मग्रंथों और तांत्रिक परंपराओं में भाद्रपद महीने की अमावस्या का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्त्व है। जहां देश के बाकी हिस्सों में इसे कुशग्रहणी या पिठोरी अमावस्या के रूप में स्नान, दान और पितरों के तर्पण के लिए जाना जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ तारापीठ में इस रात का रूप बिल्कुल अलौकिक और रहस्यमयी हो जाता है। तंत्र साधना के इस सबसे बड़े केंद्र में इस पावन तिथि को ‘कौशिकी अमावस्या’ या ‘तारा रात्रि’ के नाम से जाना जाता है।

मान्यता है कि इस विशेष रात मां तारा अपने भक्तों के बड़े से बड़े कष्ट, भय और नकारात्मक शक्तियों का नाश करती हैं। यही वजह है कि पूरे देश से तंत्र साधक, अघोरी और लाखों श्रद्धालु मां तारा की एक झलक पाने और सिद्धि प्राप्त करने तारापीठ पहुंचते हैं।

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2026 में कौशिकी अमावस्या की सही तिथि और मुहूर्त

वर्ष 2026 में कौशिकी अमावस्या की तारीख को लेकर पंचांग में समय की गणना बेहद खास है। भारतीय मानक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या तिथि की शुरुआत 10 सितंबर 2026, गुरुवार को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर होगी। यह तिथि अगले दिन यानी 11 सितंबर 2026 की सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।

10 सितंबर की रात ही क्यों मानी जाएगी ‘तारा रात्रि’?

तिथि 11 सितंबर की सुबह तक रहने के बावजूद कौशिकी अमावस्या की मुख्य महापूजा और तांत्रिक क्रियाएं 10 सितंबर की रात को ही संपन्न होंगी। ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के मर्मज्ञों का कहना है कि कौशिकी अमावस्या का संपूर्ण महात्म्य इसकी ‘निशीथ काल’ यानी मध्यरात्रि पूजा से जुड़ा है।

तारापीठ मंदिर प्रबंधन और स्थानीय साधकों के अनुसार, जो श्रद्धालु महाश्मशान में साधना करना चाहते हैं या मां तारा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए 10 सितंबर की रात ही अत्यंत फलदायी और महत्वपूर्ण रहेगी। हालांकि, जो लोग गृहस्थ जीवन में हैं और केवल स्नान-दान या पितृ कर्म करना चाहते हैं, वे 11 सितंबर की सुबह उदयातिथि के अनुसार भी दान-पुण्य कर सकते हैं।

क्यों कहते हैं इसे कौशिकी अमावस्या?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन तिथि पर देवी पार्वती के शरीर के कोश (कोशिकाओं) से मां कौशिकी का प्रादुर्भाव हुआ था, जिन्होंने शुंभ-निशुंभ जैसे महान असुरों का वध करके देवताओं को भयमुक्त किया था। तारापीठ में मां तारा के उग्र और करुणामयी दोनों रूपों की पूजा होती है। ऐसा माना जाता है कि इस रात मां तारा की आराधना करने से असाध्य रोगों, घोर संकटों और शत्रुओं के भय से मुक्ति मिलती है।

तारापीठ में इस दिन तड़के से ही महाआरती शुरू हो जाती है। द्वार खुलते ही लाखों भक्त मां के दर्शन करते हैं, वहीं पास ही स्थित द्वारका नदी के तट और प्रसिद्ध महाश्मशान में साधक दीप जलाकर, होम-हवन और मंत्रों के साथ रात भर अध्यात्मिक साधना में लीन रहते हैं।

गृहस्थ जन घर पर कैसे करें मां तारा की पूजा?

ज्योतिषाचार्यों की सलाह है कि वाममार्ग या गुप्त तंत्र साधना बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन के कभी नहीं करनी चाहिए। आम श्रद्धालुओं के लिए घर पर सात्विक पूजा ही सर्वोत्तम मानी गई है:

10 सितंबर की शाम को स्नान कर पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें।

मां तारा या मां काली के चित्र के सामने तिल के तेल या घी का दीपक प्रज्वलित करें।

मां को लाल गेंदा या गुड़हल के फूल, फल और मिष्ठान अर्पित करें।

मन की एकाग्रता के साथ ‘ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्’ या सामान्य काली मंत्रों का जाप करें।

पूजा के अंत में गरीबों को भोजन, वस्त्र या काले तिल का दान करें।

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