Krishna Kalki Dwadashi Vrat: सनातन धर्म में द्वादशी तिथि का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को ‘कृष्ण कल्कि द्वादशी’ का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम-संयम के साथ रखा जा रहा है। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु भगवान विष्णु तथा उनके दसवें भावी अवतार भगवान कल्कि की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन निष्काम भाव से व्रत रखने और कथा सुनने से जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है और मनुष्य को परम शांति की प्राप्ति होती है।
राजा विशाल की कथा: जब छल से छिन गया राज्य, तो तपस्या बनी सहारा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऋषि दुर्वासा ने सत्यतपा व्याध को इस व्रत की महिमा समझाते हुए राजा विशाल की कथा सुनाई थी। प्राचीन काल में काशी के राजा विशाल एक धर्मप्रिय और पराक्रमी शासक थे। (Kalki Dwadashi Story) हालांकि, समय के चक्र और अपनों के छल-कपट के कारण उनके ही गोत्र के लोगों ने उनका संपूर्ण राज्य और धन-संपदा छीन ली। राजपाट छिन जाने के बाद राजा विशाल ने वैराग्य धारण कर लिया और भगवान श्रीहरि की भक्ति में लीन होने के लिए गंधमादन पर्वत स्थित पावन बदरीवन चले गए, जहां उन्होंने कठोर तपस्या शुरू की।
नर-नारायण ऋषियों का आगमन और श्रीहरि के अवतारों की महिमा
राजा की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर वहां नर और नारायण ऋषि प्रकट हुए। जब ऋषियों ने राजा से उनकी इच्छा पूछी, तो राजा ने निष्ठापूर्वक केवल भगवान विष्णु की कृपा और विधिपूर्वक महायज्ञ करने का वरदान मांगा। (Lord Vishnu Kalki Avatar) तब नर ऋषि ने उन्हें भगवान नारायण के सर्वव्यापी स्वरूप और उनके विभिन्न अवतारों—मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, श्रीराम और श्रीकृष्ण—की लीलाओं का बोध कराया। ऋषियों ने बताया कि शत्रुओं पर विजय और संकटों से मुक्ति पाने के लिए भगवान के कल्कि स्वरूप का स्मरण और व्रत अनुष्ठान अत्यंत फलदायी है।
व्रत के प्रभाव से पुनः मिला राजवैभव, बदरीवन बना ‘बदरी विशाल’
ऋषियों के बताए अनुसार राजा विशाल ने पूरी श्रद्धा और नियम-संयम के साथ इस पावन द्वादशी व्रत का पालन किया। भगवान विष्णु की कृपा से उनका खोया हुआ राज्य और वैभव उन्हें पुनः प्राप्त हुआ और वे पृथ्वी पर एक महान चक्रवर्ती राजा बने। (Nar Narayan Rishi Katha) राजा विशाल के इस पावन तप और कथा के कारण ही गंधमादन पर्वत का वह क्षेत्र आगे चलकर जगत प्रसिद्ध ‘बदरी विशाल’ के नाम से जाना गया। जीवन के अंतिम पड़ाव में राजा पुनः बदरीवन लौटे, जहां उन्होंने अनेक यज्ञ कर श्रीहरि के परम पद को प्राप्त किया।
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