Kullu Dussehra 2026: हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा 21 से 27 अक्टूबर तक आयोजित किया जाएगा। कुल्लू के ढालपुर मैदान में होने वाले इस सात दिवसीय उत्सव के लिए 347 देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया गया है। इसके अलावा 20 देशों के कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया है। आयोजन में हिमाचल की पारंपरिक देव संस्कृति और लोक कलाओं के साथ अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखने को मिलेंगी।
कुल्लू दशहरे की खासियत यह है कि इसमें घाटी के देवी-देवता अपने पारंपरिक लाव-लश्कर और वाद्य यंत्रों के साथ शामिल होते हैं। कुछ देवी-देवता 150 से 200 किलोमीटर तक की पैदल यात्रा करके ढालपुर मैदान पहुंचेंगे। उनके आगमन के साथ ही पूरा क्षेत्र पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों और धार्मिक गतिविधियों से गूंज उठेगा। इस बार उत्सव की शुरुआत 21 अक्टूबर को भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा से होगी। इसके बाद देव मिलन, पारंपरिक जलेब और सांस्कृतिक संध्याओं सहित विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। समापन के दिन ब्यास नदी के किनारे प्रतीकात्मक लंका दहन होगा। दूसरे क्षेत्रों में दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाने की परंपरा है, लेकिन कुल्लू में उत्सव का मुख्य केंद्र देवी-देवताओं का भगवान रघुनाथ जी के समक्ष पहुंचना और उनसे जुड़ी परंपराएं हैं।
कारदारों की प्रामाणिकता और समिति के कार्यकाल पर विवाद
उत्सव शुरू होने से पहले देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था के अध्यक्ष ओम प्रकाश शर्मा ने करीब 136 कारदारों और उनसे संबंधित देवी-देवताओं की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आयोजन समिति की कार्यप्रणाली पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मौजूदा कार्यकारिणी का कार्यकाल 30 नवंबर 2024 को समाप्त हो गया था, इसलिए इसके बाद लिए गए फैसलों की समीक्षा की जानी चाहिए। वहीं, जिला देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि संघ में सभी 13 खंडों के कारदार शामिल हैं। उनके अनुसार, गैर-माफीदार देवी-देवताओं को भी संविधान के तहत सदस्यता का अधिकार है। गैर-माफीदार देवस्थानों से आशय ऐसे देवस्थानों से है, जिन्हें राजा या रियासत की ओर से जमीन, लगान में छूट या अन्य राजस्व संबंधी रियायतें नहीं मिली थीं।
दोत राम ठाकुर के मुताबिक, 25 सितंबर 2026 को आयोजित जनरल हाउस में जिला और खंड कार्यकारिणियों को सर्वसम्मति से 31 मार्च 2027 तक सेवा विस्तार दिया गया। उन्होंने बताया कि चुनाव 30 अप्रैल 2027 तक करवाए जाएंगे। इस मामले में दोनों पक्षों के दावों के बीच कार्यकारिणी के कार्यकाल, जनरल हाउस के फैसलों और संबंधित नियमों की स्थिति अहम बनी हुई है।
बजंतरियों के नजराने पर भी मतभेद, भुगतान के समय को लेकर अलग-अलग दावे
देवी-देवताओं के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वाले बजंतरियों के नजराने का भुगतान भी विवाद का विषय बना हुआ है। देव संस्कृति चैरिटेबल संस्था और बजंतरी संघ की मांग है कि उत्सव में भाग लेने वाले प्रत्येक बजंतरी को पहले ही दिन उसके बैंक खाते में नजराने की राशि दी जाए। उनका तर्क है कि बजंतरी पूरे सात दिन अपनी सेवाएं देते हैं और इनमें कई परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं। ऐसे में भुगतान के लिए उत्सव के समापन तक इंतजार करना उनके लिए परेशानी का कारण बन सकता है। दूसरी ओर, कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर ने बताया कि दशहरा उत्सव समिति के अध्यक्ष एवं विधायक सुंदर सिंह ठाकुर की मौजूदगी में कारदार संघ और बजंतरी संघ के बीच नजराने का भुगतान उत्सव के समापन पर करने को लेकर सहमति बनी है। उनके अनुसार, संबंधित फार्म का सत्यापन कारदार करेंगे। हालांकि, भुगतान के समय को लेकर उठे सवालों के बीच संबंधित बैठक की कार्यवाही और लागू नियमों की पुष्टि महत्वपूर्ण होगी।
ड्रोन-लेजर शो और ग्लोबल डांस से बढ़ेगा अंतरराष्ट्रीय रंग
इस बार कुल्लू दशहरे में धार्मिक और पारंपरिक आयोजनों के साथ आधुनिक तकनीक से जुड़े कार्यक्रम भी आकर्षण का केंद्र होंगे। रथयात्रा के साथ ड्रोन शो, लेजर शो और ग्लोबल डांस कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी है। उत्सव समिति के अध्यक्ष सुंदर सिंह ठाकुर के अनुसार, आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोक कला और संस्कृति के बड़े मंच के रूप में प्रस्तुत करने की योजना है। कार्यक्रमों में कुल्लवी नाटी, लालड़ी, लोक संगीत और पारंपरिक वेशभूषा के साथ कुल्लवी शॉल तथा हस्तशिल्प को भी प्रदर्शित किया जाएगा। विदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियों के जरिए अलग-अलग देशों की संस्कृतियों को मंच मिलेगा। इससे स्थानीय लोक कलाकारों और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को भी अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
हालांकि, उत्सव क्षेत्र और आसपास हवाई गतिविधियों को लेकर प्रतिबंध लगाए गए हैं। ड्रोन, पैराग्लाइडिंग और हॉट एयर बैलून जैसी गतिविधियों के संचालन के लिए पुलिस अधीक्षक कुल्लू से पहले लिखित अनुमति लेना अनिवार्य बताया गया है। ऐसे में इन गतिविधियों के संचालन से पहले संबंधित अनुमति और सुरक्षा नियमों का पालन करना होगा।
1660 के आसपास शुरू हुई थी दशहरे की परंपरा
कुल्लू दशहरे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 17वीं शताब्दी में राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी मानी जाती है। लोकमान्यता के अनुसार, वर्ष 1651 में भगवान रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से कुल्लू लाई गई थी। इसके बाद भगवान रघुनाथ जी को कुल्लू रियासत का प्रमुख आराध्य मानते हुए दशहरे की परंपरा विकसित हुई। उत्सव की शुरुआत सामान्यतः 1660 के आसपास मानी जाती है। इस आयोजन में राजपरिवार के छड़ीबरदार की भूमिका और माता हिडिंबा की उपस्थिति भी परंपरा का हिस्सा हैं। कुल्लू दशहरे में देवी-देवताओं का एकत्र होना, भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा और पारंपरिक देव मिलन इसे देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देते हैं। इस बार भी सात दिनों तक धार्मिक परंपराओं, लोक संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संगम देखने को मिलेगा। दिल्ली की रामलीला में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के साथ जलेगा 30 फीट के कॉकरोच का पुतला

