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Kurukshetra society election: कुरुक्षेत्र सोसाइटी चुनाव में बड़ी चूक: 174 वोट लाकर भी हारा प्रत्याशी, 54 वोट वाले को मिली जीत

GGaganpreet Kaur
कुरुक्षेत्र सोसाइटी चुनाव में बड़ी चूक: 174 वोट लाकर भी हारा प्रत्याशी, 54 वोट वाले को मिली जीत
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कुरुक्षेत्र। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के पिहोवा में सहकारिता चुनाव के दौरान एक ऐसा अजीबोगरीब वाकया सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ‘दी थाना मल्टीपरपज प्राइमरी एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड’ के चुनाव में एक उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट लाकर भी हार गया और बेहद कम वोट पाने वाले प्रतिद्वंद्वी के गले में जीत का हार पहना दिया गया। रिटायर्ड फौजी और ओबीसी वर्ग से ताल्लुक रखने वाले प्रत्याशी माम चंद को चुनाव में 174 वोट मिले, जबकि उनके सामने चुनाव लड़ रहे बलबीर सिंह को महज 54 वोट ही हासिल हुए। इसके बावजूद प्रशासन ने बलबीर सिंह को मेंबर घोषित कर दिया। इसके पीछे जो दलील दी गई, उसने इस पूरी चुनावी प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है।

जब वोटिंग खत्म हुई, तब याद आया सीट का रिजर्वेशन

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थाना गांव के साथ ही खेड़ी शीशगरां, गुलडेहरा, धूलगढ़ और मांगना समेत पांच गांवों की इस सोसाइटी में रविवार को 10 मेंबर पदों के लिए मतदान हुआ था। दिनभर चले शांतिपूर्ण मतदान के बाद जब शाम को नतीजों की बारी आई, तो सारा गणित ही पलट गया। माम चंद ने आरोप लगाया कि जीत का सर्टिफिकेट देने के बजाय अधिकारियों ने उन्हें बताया कि जिस सीट पर उन्होंने चुनाव लड़ा है, वह दरअसल अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए आरक्षित थी। चूंकि माम चंद ओबीसी (BC) वर्ग से आते हैं, इसलिए सबसे ज्यादा वोट पाने के बाद भी उनका चुनाव अमान्य कर दिया गया। इस फैसले के बाद से पूरे इलाके में चर्चाओं का बाजार गर्म है और ग्रामीणों में भारी रोष है।

“मेरी क्या गलती, पहले दिन पर्चा खारिज क्यों नहीं किया?”

प्रशासन के इस तर्क पर पीड़ित उम्मीदवार माम चंद ने तीखे सवाल दागे हैं। उनका कहना है कि इस चुनाव के लिए 4 मई को नामांकन भरा गया था। अगले दिन बकायदा कागजात की जांच हुई, छंटनी हुई और नाम वापसी के बाद उन्हें ‘बकरी’ का चुनाव चिन्ह अलॉट किया गया। रविवार को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक पोलिंग बूथ पर बाकायदा वोटिंग हुई। माम चंद ने सवाल उठाया कि अगर यह सीट पहले से ही एससी वर्ग के लिए रिजर्व थी, तो स्क्रूटनी के वक्त ही उनका नामांकन रद्द क्यों नहीं किया गया? जब उन्होंने अपने फॉर्म में साफ तौर पर ओबीसी वर्ग लिखा था, तो उन्हें चुनाव लड़ने की इजाजत किसने और क्यों दी? उन्होंने इसे सीधे तौर पर प्रशासनिक चूक बताते हुए इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का एलान किया है।

अधिकारी बोले- कानून के मुताबिक हुआ है सब कुछ

इस पूरे विवाद को लेकर जब पोलिंग बूथ पर तैनात एआरओ (असिस्टेंट रिटर्निंग ऑफिसर) प्रदीप कुमार से बात की गई, तो उन्होंने विभाग का बचाव किया। प्रदीप कुमार ने कहा कि चुनाव पूरी तरह हरियाणा कोऑपरेटिव सोसाइटी एक्ट 1984 की धारा 28 के तहत और नियमों के दायरे में हुआ है। उन्होंने तकनीकी पक्ष समझाते हुए बताया कि सोसाइटी में 7 मेंबर एग्रीकल्चर और 3 नॉन-एग्रीकल्चर कैटेगरी से चुने जाते हैं। नॉन-एग्रीकल्चर में नियमानुसार एक मेंबर एससी वर्ग का लेना अनिवार्य होता है। अधिकारियों की इस कानूनी दलील के बीच अब यह मामला पूरी तरह उलझ गया है, क्योंकि बुनियादी सवाल वहीं खड़ा है कि अगर सीट रिजर्व थी, तो एक गैर-आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को पूरी चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बनने ही क्यों दिया गया।

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