Mini Stroke Prevention Tips: जब भी स्ट्रोक जैसी मेडिकल इमरजेंसी का जिक्र आता है, तो जहन में एक गंभीर बीमारी की तस्वीर उभर आती है। यह एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल कंडिशन है, जो न सिर्फ इंसान को शारीरिक रूप से विकलांग बना सकती है, बल्कि जानलेवा भी साबित होती है। यही वजह है कि डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का जोर हमेशा इसके इलाज से ज्यादा बचाव यानी प्रिवेंशन पर रहता है। स्ट्रोक के खतरे को प्रभावी ढंग से कम करने के लिए मुख्य रूप से दो तरीकों—प्राइमरी प्रिवेंशन और सेकेंडरी प्रिवेंशन—को समझना सबसे जरूरी माना गया है।
प्राइमरी प्रिवेंशन: पहली बार स्ट्रोक आने से रोकने की रणनीति
प्राइमरी प्रिवेंशन का सीधा सा मतलब है कि किसी व्यक्ति को जीवन में पहली बार स्ट्रोक आने ही न दिया जाए। इसके लिए रोजमर्रा की जीवनशैली में कुछ बुनियादी बदलाव करने होते हैं। तनाव को मैनेज करना, प्रदूषण भरे माहौल से दूरी बनाना, रात में भरपूर और सुकून भरी नींद लेना, नियमित तौर पर कसरत करना और स्मोकिंग की बुरी आदत से तौबा करना इसमें सबसे ऊपर है। इसके अलावा, उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर के स्तर को हमेशा नियंत्रण में रखना भी इस रणनीति का अहम हिस्सा है।
सेकेंडरी प्रिवेंशन: ‘मिनी स्ट्रोक’ यानी TIA को हल्के में न लें
दूसरी तरफ, सेकेंडरी प्रिवेंशन उन लोगों के लिए जीवन बचाने का काम करता है, जिन्हें पहले कभी स्ट्रोक या टीआईए (Transient Ischaemic Attack) आ चुका है। आसान भाषा में समझें तो टीआईए को ‘मिनी स्ट्रोक’ कहा जाता है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब दिमाग के किसी हिस्से में कुछ समय के लिए रक्त का प्रवाह रुक जाता है, जिससे स्ट्रोक जैसे लक्षण तो दिखते हैं और फिर वे ठीक भी हो जाते हैं।
हालांकि, लोग अक्सर इसे मामूली समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन चिकित्सा जगत की मानें तो यह भविष्य में आने वाले किसी बड़े और खतरनाक स्ट्रोक की घंटी होती है। ऐसे मरीजों के लिए डॉक्टर की सलाह के बिना एक दिन भी दवा छोड़ना भारी पड़ सकता है।
दवाइयों की निरंतरता और ब्लड थिनर्स का महत्व
ददोबारा स्ट्रोक के खतरे को टालने के लिए चिकित्सक आमतौर पर एंटीप्लेटलेट या एंटीकोआगुलेंट दवाइयों के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल, हाई बीपी और डायबिटीज को कंट्रोल करने वाली दवाएं लिखते हैं। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर कुछ मरीजों को विटामिन सप्लीमेंट्स भी दिए जाते हैं।
कई बार बुजुर्ग मरीजों में एट्रियल फाइब्रिलेशन या दिल से जुड़ी अन्य जटिलताएं देखने को मिलती हैं, जिसके कारण दिल के अंदर खून के थक्के जमने का खतरा रहता है। ऐसे मामलों में स्ट्रॉन्ग ब्लड थिनर्स की जरूरत पड़ती है। एक बड़ी समस्या यह भी देखी जाती है कि मरीज या उनके परिजन बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं को बीच में ही बंद कर देते हैं, जो कि अंदर ही अंदर एक बड़ा जोखिम तैयार कर रहा होता है।
गर्दन की आर्टरीज की जांच से खुलती है बीमारी की परतें
दिमाग तक साफ खून पहुंचाने वाली गर्दन की मुख्य आर्टरीज में यदि किसी तरह की रुकावट या ब्लॉकेज आ जाए, तो समय रहते उसका पता लगाना बेहद जरूरी हो जाता है। इसके लिए ‘कैरोटिड डॉपलर अल्ट्रासाउंड’ सबसे भरोसेमंद और आसान जरिया है। यह एक नॉन-इन्वेसिव टेस्ट है, जिसमें साउंड वेव्स (ध्वनि तरंगों) की मदद से यह देखा जाता है कि गर्दन की नसों में कोई सिकुड़न या रुकावट तो नहीं है। इस टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर ही डॉक्टर आगे की दवाएं तय करते हैं या फिर जरूरत पड़ने पर स्टेंटिंग जैसी मेडिकल प्रक्रिया की सलाह देते हैं। सेहत से जुड़ी छोटी सी भी लापरवाही कई बार भारी पड़ सकती है, इसलिए शरीर के संकेतों को समय रहते पहचानना ही बुद्धिमानी है।

