Kurukshetra News: कुरुक्षेत्र। धर्मनगरी कुरुक्षेत्र की पावन धरा पर स्थित ऐतिहासिक संगमेश्वर महादेव धाम अरुणाय सोमवार की सुबह एक अलौकिक घटना का गवाह बना। रोज की तरह जब सुबह मंदिर के कपाट खोले गए, तो वहां का नजारा देखकर सेवादारों और पुजारियों की आंखें फटी की फटी रह गईं। भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर एक काला नाग कुंडली मारकर लिपटा हुआ था।
इस अद्भुत और दुर्लभ दृश्य की खबर जैसे ही हवा की तरह आसपास के गांवों में फैली, मंदिर परिसर बम-बम भोले के जयकारों से गूंज उठा और देखते ही देखते श्रद्धालुओं का भारी हुजूम गर्भगृह के बाहर जमा हो गया।
कंबल हटाते ही सुनाई दी फुंकार, आधे घंटे तक थमी रहीं सांसें
सेवादल प्रबंधक भूषण गौतम ने बताया कि प्राचीन परंपरा के अनुसार, रात को संगमेश्वर महादेव का भव्य श्रृंगार करने के बाद उन्हें कंबल ओढ़ाया जाता है। सोमवार तड़के जब मुख्य पुजारी पंडित गंगौत्री और सेवादार गर्भगृह खोलने पहुंचे, तो जैसे ही वे कंबल हटाने के लिए आगे बढ़े, उन्हें भीतर से तेज फुंकारने की आवाज सुनाई दी।
किसी अनहोनी की आशंका के चलते पुजारियों ने सीधे हाथ लगाने के बजाय वाइपर के पाइप से धीरे से कंबल को सरकाया। कंबल हटते ही सामने का नजारा देखकर सब स्तब्ध रह गए; एक लंबा काला नाग शिवलिंग को अपनी आगोश में लिए बैठा था। इसकी सूचना तुरंत महंत विश्वनाथ गिरी और अखाड़े के अन्य साधु-संतों को दी गई।
श्रद्धा और कौतूहल का माहौल, भीड़ बढ़ती देख समाधि की ओर गए नागराज
शिवलिंग पर नागराज के लिपटने की बात सुनते ही कुरुक्षेत्र और आसपास के जिलों से आए भक्तों ने इस पल को अपने कैमरों और मोबाइल में कैद करना शुरू कर दिया।
कई श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल के साथ सेल्फी लेते भी नजर आए। भूषण गौतम के अनुसार, इस परिसर में नागों का दिखना नया नहीं है और पिछले कई दशकों में उन्होंने कभी किसी भक्त को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है। हालांकि, काफी सालों से नाग ने साक्षात शिवलिंग पर आकर दर्शन नहीं दिए थे। करीब आधे घंटे तक भक्तों को निहारने के बाद, जैसे ही मंदिर में भीड़ का दबाव बेहद बढ़ गया, नाग शांति से गर्भगृह से निकलकर पास ही बनी संतों की समाधि की तरफ चला गया।
झाड़ियों के बीच खोज और नाग की वह प्राचीन पौराणिक कथा
इस मंदिर का इतिहास बेहद रोचक है और इसका सीधा संबंध नागराज से जुड़ा है। लोक मान्यताओं के अनुसार, सदियों पहले सिद्ध महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों के साथ इसी निर्जन इलाके में धूनी रमाते थे। एक दिन उन्हें घनी झाड़ियों के बीच दीमक का एक विशाल ढेर (बांबी) दिखाई दिया। सफाई करने पर वहां से एक दिव्य शिवलिंग प्रकट हुआ।
महात्मा ने जब उस शिवलिंग को दूसरी जगह स्थापित करने के लिए खुदाई शुरू कराई, तो पूरा दिन खोदने के बाद भी पिंडी का अंतिम छोर नहीं मिला। उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर मंदिर उसी स्थान पर बनाने का आदेश दिया। अगले दिन जब महात्मा वहां पहुंचे, तो एक विशाल काला नाग ठीक उसी तरह शिवलिंग से लिपटा हुआ था, जैसा आज सोमवार को देखा गया।
1946 में बना था वर्तमान स्वरूप, अब पूरी तरह डिजिटल हुआ भोले का दरबार
आज जो भव्य मंदिर हम देखते हैं, उसकी नींव साल 1942 के आसपास तत्कालीन सचिव महंत गिरधर नारायण गिरि की पहल पर रखी गई थी। बाद में महंत गिरधर नारायण पुरी और बाबा शरण पुरी के अथक प्रयासों से साल 1946 में तत्कालीन समय के करीब एक लाख रुपये की भारी-भरकम लागत से इस भव्य मंदिर और डेरे का निर्माण कार्य पूरा हुआ था।
बदलते समय के साथ अब भोले का यह दरबार पूरी तरह हाई-टेक और डिजिटल हो गया है। रविवार को ही मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट लॉन्च की गई है, जिसके माध्यम से दुनिया भर में बैठे श्रद्धालु मात्र एक क्लिक या क्यूआर कोड स्कैन करके दैनिक आरती, श्रावण मास के भंडारों और धाम के पौराणिक इतिहास की सटीक जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

