नई दिल्ली, 23 जून, 2026 (Smartphone price hike)। नया स्मार्टफोन खरीदने की सोच रहे भारतीय ग्राहकों की जेब पर अब बहुत तगड़ा डाका पड़ने जा रहा है क्योंकि टेक बाजार से बेहद परेशान करने वाले संकेत बाहर आ रहे हैं। टेक कंपनियों के रिटेल चैनलों और काउंटरपॉइंट रिसर्च के ताजातरीन आंकड़ों के मुताबिक आने वाले फेस्टिव सीजन में मोबाइल फोन पहले के मुकाबले काफी ज्यादा महंगे बिकेंगे। सबसे तगड़ा झटका एप्पल लवर्स को अपकमिंग आईफोन 18 सीरीज के साथ लगने वाला है, लेकिन सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि पूरा स्मार्टफोन बाजार कंपोनेंट्स की बढ़ती लागत के चलते भयंकर दबाव झेल रहा है। बिगड़ गया सबका बजट।
बाजार में मंदी और महंगाई का यह खौफनाक असर अब साफ तौर पर जमीन पर दिखने लगा है। एप्पल के सर्वेसर्वा टिम कुक ने भी हालिया ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में साफ इशारा कर दिया है कि इंटरनेशनल मार्केट में मेमोरी चिप्स की आसमान छूती कीमतों के बीच पुराने दामों पर नए आईफोन बेचना अब उनके बूते की बात नहीं रह गई है। कंपनी ने हालांकि अभी तक अपने फ्लैगशिप डिवाइसेज की आधिकारिक एमआरपी में कोई सीधी बढ़ोतरी नहीं की है, लेकिन रिटेल स्टोर्स को मिलने वाले कैशबैक ऑफर्स, बंपर डिस्काउंट और स्पेशल डील्स को अंदरखाने बंद करना शुरू कर दिया है। ऑफर्स गायब हो चुके हैं।
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दबाव केवल बजट सेगमेंट पर नहीं है बल्कि प्रीमियम कैटेगिरी के स्मार्टफोन भी इस आग में पूरी तरह झुलस रहे हैं। दक्षिण कोरियाई दिग्गज सैमसंग का सबसे प्रीमियम फ्लैगशिप फोन गैलेक्सी S26 अल्ट्रा (Galaxy S26 Ultra) अपने पुराने मॉडल के मुकाबले सीधे 10,000 रुपये से ज्यादा की बढ़ी हुई कीमत पर भारतीय बाजार में उतारा गया है। इसी तरह वनप्लस और आईक्यू (iQOO) ने भी अपने नए प्रीमियम स्मार्टफोन्स की कीमतों में बिना किसी शोर-शराबे के 5,000 रुपये से लेकर 12,000 रुपये तक का भारी-भरकम इजाफा कर दिया है। नथिंग (Nothing) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कार्ल पेई ने भी ऑन-रिकॉर्ड स्वीकार किया है कि 30,000 रुपये से ऊपर वाले प्रीमियम फोन्स पर औसतन 7,000 रुपये की अतिरिक्त लागत का सीधा बोझ बढ़ चुका है।
आखिर क्यों बढ़ रही है मोबाइल की लागत?
इस भयंकर मूल्य वृद्धि के पीछे की सबसे बड़ी वजह रैम और स्टोरेज में इस्तेमाल होने वाली DRAM और NAND फ्लैश मेमोरी चिप्स की ग्लोबल किल्लत है। काउंटरपॉइंट की बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक पिछले केवल तीन क्वार्टर्स के भीतर इन मेमोरी चिप्स की कीमतों में करीब 400 प्रतिशत तक का जबरदस्त उछाल आया है। जो सिलिकॉन मेमोरी पहले मैन्युफैक्चरर्स को महज 20 डॉलर में आसानी से मिल जाती थी, उसकी कीमत अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में 75 डॉलर के पार पहुंच चुकी है। बेकाबू हुई महंगाई।
ग्लोबल टेक सेक्टर में आई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की आंधी ने इस पूरी क्राइसिस को और ज्यादा खतरनाक मोड़ दे दिया है। एनवीडिया, ओपनएआई और गूगल जैसी दुनिया की महाबली कंपनियां इन दिनों युद्ध स्तर पर अपने नए डेटा सेंटर और सुपरकंप्यूटर तैयार करने में जुटी हुई हैं, जिनमें खरबों की संख्या में हाई-एंड मेमोरी चिप्स की खपत हो रही है। ज्यादा प्रॉफिट मार्जिन मिलने की लालच में चिप बनाने वाली बड़ी फैक्ट्रियों ने मोबाइल कंपनियों को दरकिनार कर एआई इंडस्ट्री को पहली प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। स्मार्टफोन असेंबल करने की कुल लागत में जो रैम और स्टोरेज पहले केवल 10 से 15 फीसदी हिस्सेदारी रखती थी, उसका हिस्सा अब बढ़कर 30 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
ब्रांड्स ने की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी
एआईएमआरए (AIMRA) और रिटेल ट्रैकर के आंकड़ों पर नजर डालें तो वीवो (Vivo) ने अपने कई रनिंग मॉडल्स के दाम में 18 से लेकर 40 प्रतिशत तक की बंपर बढ़ोतरी कर दी है। ओप्पो (Oppo) के स्मार्टफोन भी वेरिएंट्स के हिसाब से 9 से 41 प्रतिशत तक महंगे हो चुके हैं। चीनी टेक दिग्गज शाओमी (Xiaomi) ने 3 से 32 प्रतिशत और रियलमी (Realme) ने अपने चुनिंदा मॉडल्स पर 6 से लेकर 53 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाकर ग्राहकों को करारा झटका दिया है। रियलमी के कई नए अपग्रेड मॉडल तो पुराने वेरिएंट्स की तुलना में सीधे 5,000 से 15,000 रुपये तक महंगे लॉन्च किए गए हैं। मोटोरोला के जो किफायती 5G स्मार्टफोन पहले 9,999 रुपये में मिल जाते थे, उनकी शुरुआती एक्स-शोरूम कीमत अब 11,999 रुपये से ऊपर पहुंच चुकी है।
इस भयंकर महंगाई का सीधा असर भारतीय मिडिल क्लास उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर साफ नजर आ रहा है। वर्ष 2026 की पहली तिमाही के जो आधिकारिक शिपमेंट आंकड़े सामने आए हैं, उनके मुताबिक भारत के स्मार्टफोन बाजार में 3 प्रतिशत की साफ गिरावट दर्ज हुई है, जिसे पिछले छह सालों का सबसे सुस्त और कमजोर परफॉर्मेंस माना जा रहा है। बाजार से 10,000 रुपये से कम कीमत वाले दमदार 5G फोन पूरी तरह गायब हो रहे हैं और जो फोन पहले 15,000 रुपये के बजट में आ जाते थे, उनके लिए अब ग्राहकों को काउंटर पर 20,000 से 25,000 रुपये तक ढीले करने पड़ रहे हैं।
टेक एक्सपर्ट्स का साफ मानना है कि मेमोरी चिप्स की यह भीषण कमी और बढ़ी हुई उत्पादन लागत का चौतरफा दबाव साल 2027 के अंत तक ऐसे ही बरकरार रह सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए भारतीय ग्राहक अब नए फोन खरीदने के बजाय अपने पुराने हैंडसेट को ही ज्यादा समय तक घिस रहे हैं, जिसके कारण रिफर्बिश्ड यानी सेकेंड हैंड स्मार्टफोन मार्केट का धंधा तेजी से चमक उठा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इस साल सेकेंड हैंड मोबाइल की बिक्री 2.5 करोड़ यूनिट के पुराने रिकॉर्ड को तोड़कर सीधे 3.2 करोड़ यूनिट के पार पहुंच सकती है।

