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Thalassemia Treatment: थैलेसीमिया का इलाज अब मुमकिन, पिहोवा के चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव गोयल ने बताए उपाय

AAmandeep Singh
Thalassemia Treatment: थैलेसीमिया का इलाज अब मुमकिन, पिहोवा के चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव गोयल ने बताए उपाय
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पिहोवा। चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे नए अनुसंधानों ने कई ऐसी बीमारियों के इलाज की राह आसान कर दी है, जिन्हें कभी लाइलाज या बेहद डरावना माना जाता था। ऐसी ही एक जन्मजात बीमारी है थैलेसीमिया। पिहोवा स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष बैठक को संबोधित करते हुए प्रवर चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजीव गोयल ने कहा कि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों को अब निराश होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सही समय पर सटीक जांच और आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के जरिए इसका मुकम्मल इलाज संभव है।

कुरुक्षेत्र के एलएनजेपी (LNJP) अस्पताल भेजे जा रहे हैं ब्लड सैंपल

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डॉ. संजीव गोयल ने चिकित्सा अधिकारियों और सुपरवाइजरों के साथ जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा करते हुए बताया कि सरकारी स्तर पर इस बीमारी की जांच की मुफ्त और पुख्ता व्यवस्था की गई है। उन्होंने कहा कि पिहोवा और आसपास के इलाकों से संदिग्ध मरीजों के ब्लड सैंपल एकत्र कर उन्हें विस्तृत जांच के लिए जिला मुख्यालय स्थित लोक नायक जयप्रकाश (LNJP) अस्पताल, कुरुक्षेत्र भेजा जाता है। उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि वे ओपीडी में आने वाले बच्चों की सघन निगरानी करें ताकि किसी भी स्तर पर चूक की गुंजाइश न रहे।

बच्चों में इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज, सीबीसी टेस्ट से खुलती है कलाई

इस बीमारी की गंभीरता और इसके लक्षणों पर बात करते हुए प्रवर चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि थैलेसीमिया सीधे तौर पर शरीर में खून (हीमोग्लोबिन) बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसके लक्षणों की पहचान करना बहुत मुश्किल नहीं है। अगर किसी बच्चे में अत्यधिक थकान, हर समय सुस्ती रहना, चेहरे और आंखों का रंग लगातार पीला पड़ना (जिसे अक्सर लोग सामान्य पीलिया समझ लेते हैं) और उम्र के हिसाब से शारीरिक विकास का धीमा होना जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत सचेत हो जाना चाहिए। डॉक्टर के मुताबिक, सीबीसी (कम्प्लीट ब्लड काउंट) और सीरम आयरन टेस्ट जैसे बुनियादी लैब टेस्ट से इस बीमारी का शुरुआती चरण में ही आसानी से पता लगाया जा सकता है।

ब्लड ट्रांसफ्यूजन से लेकर जीन थेरेपी तक हैं विकल्प, हेमेटोलॉजिस्ट की देखरेख जरूरी

चिकित्सा विज्ञान में आए बदलावों का जिक्र करते हुए डॉ. गोयल ने बताया कि आज के दौर में थैलेसीमिया के इलाज के लिए कई कारगर तरीके मौजूद हैं। मरीज की स्थिति के आधार पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन (नियमित खून चढ़ाना), बोन मैरो ट्रांसप्लांट और अब अत्याधुनिक ‘जीन थेरेपी’ के जरिए भी इस बीमारी पर काबू पाया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को किसी सामान्य डॉक्टर के बजाय विशेषज्ञ ‘हेमेटोलॉजिस्ट’ (रक्त रोग विशेषज्ञ) की देखरेख और नियमित चिकित्सा परामर्श में ही रखना चाहिए।

बैठक के समापन पर उन्होंने फील्ड में तैनात स्वास्थ्य कर्मियों और आशा वर्कर्स को कड़े निर्देश जारी किए कि वे गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के माता-पिता को थैलेसीमिया के प्रति जागरूक करें, ताकि समाज को इस आनुवंशिक बीमारी के चंगुल से बचाया जा सके।

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