September 30, 2026

जोधपुर में दुनिया के लड़ाकू विमानों का जमावड़ा, A-400M से राफेल में हवा में भरा ईंधन; एक साथ उड़ेंगे 80 फाइटर जेट

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जोधपुर में दुनिया के लड़ाकू विमानों का जमावड़ा, A-400M से राफेल में हवा में भरा ईंधन; एक साथ उड़ेंगे 80 फाइटर जेट

जोधपुर में एक साथ उड़ेंगे 80 फाइटर जेट

Tarang Shakti 2026: राजस्थान के जोधपुर में भारतीय वायुसेना के बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास ‘तरंग शक्ति 2026’ के दौरान आसमान में दुनिया के कई आधुनिक लड़ाकू विमान अपनी ताकत दिखा रहे हैं। इस अभ्यास में आठ देशों के 60 से 80 फाइटर जेट एक साथ उड़ान भरेंगे। भारत में मौजूद फ्रांस के दूतावास ने इसकी जानकारी दी है। अभ्यास में भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और तेजस जैसे लड़ाकू विमानों के साथ विदेशी वायुसेनाओं के विमान भी शामिल हैं। मंगलवार को युद्धाभ्यास के चौथे दिन सुखोई ने राफेल को लीड किया। इस दौरान फ्रांस के एयरबस A-400M और A-330 मल्टी रोल टैंकर ट्रांसपोर्ट (MRTT) विमान भी अभ्यास में शामिल हुए।

40 हजार फीट की ऊंचाई पर A-400M से राफेल में हवा के दौरान ईंधन भरने की प्रैक्टिस की गई। इस तरह के अभ्यास में विमानों के बीच सटीक तालमेल और पायलटों की दक्षता अहम होती है। 12 अक्टूबर तक चलने वाले इस युद्धाभ्यास में अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमान और भारत के तेजस सहित कई आधुनिक विमान हिस्सा ले रहे हैं। लड़ाकू विमानों के साथ परिवहन और ईंधन भरने वाले विमान भी अभ्यास का हिस्सा हैं। इस आयोजन का एक अहम पहलू यह भी है कि इसमें शामिल देशों के प्रतिनिधियों को भारतीय रक्षा उद्योग और स्वदेशी तकनीक को करीब से देखने का अवसर मिला है।

 

 

जोधपुर के आसमान में सुखोई ने राफेल को किया लीड

तरंग शक्ति 2026 के चौथे दिन जोधपुर में सुखोई और राफेल की संयुक्त उड़ान अभ्यास का खास हिस्सा रही। भारतीय वायुसेना के सुखोई-30 एमकेआई ने राफेल को लीड किया। इस दौरान दोनों विमानों के पायलटों ने निर्धारित उड़ान योजना के अनुसार तालमेल के साथ अभ्यास किया। सुखोई-30 एमकेआई भारतीय वायुसेना का प्रमुख बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है।

वहीं, राफेल भी हवा से हवा और हवा से जमीन पर हमले सहित कई तरह के मिशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। दोनों विमानों की संयुक्त उड़ान से पायलटों को अलग-अलग विमान प्रणालियों के साथ काम करने और साझा मिशन में तालमेल बनाने का अवसर मिलता है। इस तरह के युद्धाभ्यास में विमानों का एक साथ उड़ान भरना ही एकमात्र उद्देश्य नहीं होता। इसमें पायलटों को निर्धारित निर्देशों के अनुसार उड़ान भरने, एक-दूसरे के साथ संपर्क बनाए रखने और अलग-अलग परिस्थितियों में समन्वय करने का अभ्यास भी कराया जाता है। विदेशी वायुसेनाओं की भागीदारी से भारतीय पायलटों को दूसरी सेनाओं की उड़ान प्रक्रियाओं को समझने का मौका मिलता है।

 

 

40 हजार फीट की ऊंचाई पर राफेल में भरा ईंधन

युद्धाभ्यास के दौरान हवा में ईंधन भरने की प्रक्रिया भी अभ्यास का अहम हिस्सा रही। फ्रांस के एयरबस A-400M विमान से 40 हजार फीट की ऊंचाई पर राफेल में ईंधन भरने की प्रैक्टिस की गई। इस प्रक्रिया को मिड-एयर रिफ्यूलिंग कहा जाता है। इसमें एक विमान उड़ान के दौरान दूसरे विमान को ईंधन देता है, जिससे लड़ाकू विमान को बीच में जमीन पर उतरे बिना अपनी उड़ान जारी रखने में मदद मिलती है। मिड-एयर रिफ्यूलिंग के लिए दोनों विमानों के बीच बेहद सटीक तालमेल जरूरी होता है।

ईंधन लेने वाले लड़ाकू विमान को टैंकर के निर्धारित हिस्से के पास सही गति और दूरी बनाए रखनी होती है। पायलटों को हवा में लगातार विमान की स्थिति पर नजर रखनी पड़ती है। इस दौरान मौसम, ऊंचाई और विमान की गति जैसे कारक भी अहम होते हैं। हवा में ईंधन भरने की क्षमता लड़ाकू विमानों की परिचालन सीमा बढ़ाने में मदद करती है। लंबी दूरी के अभियानों में यह तकनीक खास भूमिका निभाती है, क्योंकि इससे विमान को ईंधन लेने के लिए बार-बार बेस पर लौटने की जरूरत कम हो सकती है। तरंग शक्ति में इस प्रक्रिया का अभ्यास पायलटों को ऐसी परिस्थितियों में काम करने का अनुभव देता है।

 

 

फ्रांस के A-400M और A-330 MRTT ने भी लिया हिस्सा

फ्रांस की ओर से युद्धाभ्यास में एयरबस A-400M और A-330 मल्टी रोल टैंकर ट्रांसपोर्ट (MRTT) विमान शामिल हुए। A-400M एक सैन्य परिवहन विमान है, जिसका इस्तेमाल सैनिकों और सैन्य उपकरणों को ले जाने के साथ अन्य विशेष अभियानों में भी किया जा सकता है। इस अभ्यास में इसकी भूमिका हवा में ईंधन भरने के प्रशिक्षण से भी जुड़ी रही। A-330 MRTT एक बहुउद्देशीय टैंकर परिवहन विमान है। इसका इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों को ईंधन देने और परिवहन संबंधी जरूरतों के लिए किया जा सकता है।

ऐसे विमान किसी भी वायुसेना के अभियान में सहायक भूमिका निभाते हैं, क्योंकि लड़ाकू विमानों को लंबे समय तक उड़ान भरने और दूर के क्षेत्रों तक पहुंचने में इनकी मदद मिलती है। तरंग शक्ति में लड़ाकू विमानों के साथ ऐसे सहायक विमानों की मौजूदगी अभ्यास को व्यापक बनाती है। इससे पायलटों को सिर्फ हवाई मुकाबले से जुड़ी प्रक्रियाओं का ही नहीं, बल्कि ईंधन और परिवहन सहायता के साथ संयुक्त अभियान चलाने का भी अभ्यास मिलता है।

 

 

अमेरिका के F-35 और भारत के तेजस भी अभ्यास में शामिल

तरंग शक्ति 2026 में अमेरिका के F-35 लड़ाकू विमान और भारत के तेजस भी शामिल हैं। F-35 अपनी स्टेल्थ तकनीक और आधुनिक सेंसर प्रणाली के लिए जाना जाता है। वहीं, तेजस भारत में विकसित हल्का लड़ाकू विमान है। दोनों विमानों की भागीदारी इस बहुराष्ट्रीय अभ्यास में अलग-अलग देशों की विमान प्रणालियों को एक साथ लाती है। भारतीय वायुसेना के लिए तेजस स्वदेशी लड़ाकू विमान क्षमता का अहम हिस्सा है। दूसरी ओर, राफेल और सुखोई जैसे विमानों के साथ अभ्यास से पायलटों को अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमानों के साथ उड़ान भरने का अनुभव मिलता है। ऐसे आयोजनों में विमान संचालन, संचार और संयुक्त मिशन की योजना पर काम किया जाता है। जोधपुर में चल रहा यह अभ्यास 12 अक्टूबर तक जारी रहेगा। इसमें लड़ाकू विमानों के अलावा परिवहन और ईंधन भरने वाले विमान भी शामिल हैं। अलग-अलग देशों की वायुसेनाओं के बीच संयुक्त प्रशिक्षण और आपसी तालमेल इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है।

 

 

बेंगलुरु में 28 देशों के प्रतिनिधियों ने देखी भारतीय रक्षा कंपनियों की क्षमता

तरंग शक्ति 2026 के दौरान केवल आसमान में ही गतिविधियां नहीं हो रही हैं। इस युद्धाभ्यास में शामिल देशों के पर्यवेक्षकों ने बेंगलुरु में भारत की प्रमुख रक्षा कंपनियों और अनुसंधान संस्थानों का भी दौरा किया। इस दौरे में 28 से ज्यादा विदेशी पर्यवेक्षक शामिल हुए। प्रतिनिधिमंडल में इंडोनेशिया, थाईलैंड, ब्राजील, पेरू, अल्जीरिया, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट और मालदीव सहित कई देशों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

विदेशी प्रतिनिधियों ने भारत के रक्षा उत्पादन और एयरोस्पेस क्षेत्र से जुड़ी क्षमताओं को करीब से समझा। इस दौरे का उद्देश्य उन्हें भारत में विकसित हो रही रक्षा तकनीक, स्वदेशी उपकरणों और उत्पादन व्यवस्था की जानकारी देना था। प्रतिनिधिमंडल ने देश के प्रमुख रक्षा संस्थानों में जाकर उनके कामकाज और तकनीकी क्षमताओं को देखा। इस तरह का दौरा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास को केवल उड़ान और प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रखता। इसमें भाग लेने वाले देशों को मेजबान देश के रक्षा उद्योग और तकनीकी विकास को समझने का अवसर भी मिलता है। भारत के लिए यह अपने रक्षा उत्पादन और स्वदेशी तकनीक को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने प्रस्तुत करने का मंच है।

 

 

HAL, BEL और NAL पहुंचे विदेशी प्रतिनिधि

बेंगलुरु दौरे के दौरान विदेशी प्रतिनिधिमंडल ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL), भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरीज (NAL) का दौरा किया। ये संस्थान भारत के एयरोस्पेस, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और विमानन अनुसंधान से जुड़े प्रमुख केंद्र हैं।

HAL में प्रतिनिधियों को भारत की विमान निर्माण और एयरोस्पेस क्षमताओं को समझने का अवसर मिला। BEL रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में काम करती है, जबकि NAL विमानन और एयरोस्पेस से संबंधित अनुसंधान एवं विकास में शामिल है। इन संस्थानों के दौरे के दौरान विदेशी पर्यवेक्षकों ने भारत की स्वदेशी तकनीक और उन्नत प्रणालियों के बारे में जानकारी हासिल की।

इस दौरे से विदेशी प्रतिनिधियों को भारतीय रक्षा उद्योग की विभिन्न क्षमताओं को एक साथ देखने का अवसर मिला। विमान निर्माण से लेकर रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स और अनुसंधान तक, इन संस्थानों की भूमिका देश की रक्षा तकनीक को विकसित करने में अहम है।

 

 

रक्षा उत्पादों के निर्यात और विदेशी सहयोग पर नजर

रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के औद्योगिक दौरे का उद्देश्य केवल सैन्य अभ्यास तक सीमित नहीं है। मित्र देशों के प्रतिनिधियों को भारतीय रक्षा कंपनियों और स्वदेशी तकनीक से परिचित कराने से भविष्य में रक्षा क्षेत्र में सहयोग के अवसर बन सकते हैं। भारतीय रक्षा उत्पादों के निर्यात और तकनीकी साझेदारी के लिए भी ऐसे संपर्क उपयोगी हो सकते हैं।

हालांकि, किसी प्रतिनिधिमंडल के दौरे को अपने आप में किसी रक्षा सौदे या निर्यात समझौते की पुष्टि नहीं माना जा सकता। ऐसे दौरे संभावित सहयोग और तकनीकी जानकारी साझा करने का अवसर देते हैं। किसी वास्तविक समझौते या खरीद के लिए संबंधित देशों और कंपनियों के बीच अलग से बातचीत और औपचारिक प्रक्रिया जरूरी होती है।

तरंग शक्ति 2026 के दौरान जोधपुर में हो रहा हवाई अभ्यास और बेंगलुरु में विदेशी प्रतिनिधियों का रक्षा संस्थानों का दौरा, दोनों ही भारत की सैन्य और औद्योगिक क्षमताओं को सामने लाने से जुड़े हैं। एक ओर अलग-अलग देशों के पायलट संयुक्त उड़ान और तकनीकी प्रक्रियाओं का अभ्यास कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विदेशी पर्यवेक्षक भारत के रक्षा उत्पादन और अनुसंधान संस्थानों को समझ रहे हैं।

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