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Bhiwani News: सिद्ध पीठ बाबा जहर गिरि आश्रम के पीठाधीश्वर बोले- मंत्रों को चैतन्य करती है गुप्त नवरात्रि की अग्नि

Bhiwani News: सिद्ध पीठ बाबा जहर गिरि आश्रम के पीठाधीश्वर बोले- मंत्रों को चैतन्य करती है गुप्त नवरात्रि की अग्नि

माघ और आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि क्यों है तांत्रिकों के लिए खास? भिवानी के संत से जानिए गूढ़ बातें

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AAmandeep Singh

Bhiwani News: भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में साल में आने वाली चार नवरात्रियों का विशेष महत्व है, लेकिन इनमें से दो को ‘गुप्त नवरात्रि’ कहा जाता है, जिनके बारे में आम जनमानस को बहुत कम जानकारी होती है।

भिवानी के प्रसिद्ध सिद्ध पीठ बाबा जहर गिरि आश्रम के पीठाधीश्वर महंत डॉ. अशोक गिरी ने इस गूढ़ विषय पर चर्चा करते हुए बताया कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि जहां सामाजिक उत्सव और सार्वजनिक पूजा-अर्चना के प्रतीक हैं, वहीं माघ और आषाढ़ महीने में आने वाली गुप्त नवरात्रि पूरी तरह से अंतर्मुखी साधना, तंत्र क्रियाओं और कठिन संकल्पों के लिए समर्पित है। यह वह समय है जब साधक संसार से कटकर अपनी आंतरिक शक्तियों को जागृत करने में जुट जाते हैं।

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तीन स्तरों पर काम करता है यज्ञ: आध्यात्मिक, मानसिक और पर्यावरणीय लाभ

महंत डॉ. अशोक गिरी ने गुप्त नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले यज्ञ और हवन के वैज्ञानिक व आध्यात्मिक पहलुओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि इस अवधि में दी जाने वाली आहुतियां मुख्य रूप से तीन स्तरों पर अपना प्रभाव दिखाती हैं:

सिद्धियों की त्वरित प्राप्ति: इस विशेष कालखंड में किए गए मंत्र जप और उसके बाद दी गई आहुतियों से साधक को बहुत जल्द मानसिक और आत्मिक बल प्राप्त होता है।

मंत्रों का चैतन्य होना: शाक्त और तांत्रिक परंपरा में माना जाता है कि बिना अग्नि साक्षी के कोई भी गुप्त अनुष्ठान अधूरा है। यज्ञ की पवित्र अग्नि ही निराकार मंत्र को साकार शक्ति में तब्दील करती है।

नकारात्मक ऊर्जा का नाश: हवन में प्रयुक्त होने वाली दिव्य औषधियों और समिधाओं से निकलने वाला धुआं न केवल वातावरण से हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करता है, बल्कि घर और मस्तिष्क के भीतर बैठी नकारात्मकता को भी दूर भगाता है।

नौ देवियां नहीं, यहां होती है ‘दस महाविद्याओं’ की गुप्त आराधना

आमतौर पर नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों (शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री तक) की पूजा की जाती है, लेकिन डॉ. अशोक गिरी के मुताबिक, गुप्त नवरात्रि का पूरा ताना-बाना ‘दस महाविद्याओं’ के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस दौरान मां काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, बगलामुखी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, मातंगी और कमला जैसी परम शक्तिशाली तांत्रिक देवियों की आराधना की जाती है।

इन देवियों के अत्यंत उग्र और प्रभावी बीज मंत्रों को जागृत करने के लिए साधक आधी रात को विशेष हवन अनुष्ठान करते हैं। इस दौरान दिव्य शक्ति के प्रतीक ग्रंथ ‘दुर्गा सप्तशती’ के श्लोकों से दी जाने वाली आहुतियां हर प्रकार के विघ्न-बाधाओं को भस्म कर देती हैं।

गुरु की देखरेख और पूर्ण गोपनीयता है सफलता की कुंजी

पीठाधीश्वर ने अंत में आगाह करते हुए कहा कि गुप्त नवरात्रि की साधना का पहला नियम ही ‘गोपनीयता’ है। इसे न तो प्रदर्शित किया जाता है और ना ही इसका ढिंढोरा पीटा जाता है। यह कठिन साधना केवल एक योग्य और पूर्ण गुरु के कड़े मार्गदर्शन में, पूर्ण ब्रह्मचर्य, नियम और इंद्रिय संयम के साथ ही संभव है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई गृहस्थ भी पूरी श्रद्धा, शुद्ध भाव और बिना किसी स्वार्थ के इस दौरान यज्ञ या सामान्य दीप प्रज्वलन भी करता है, तो मां की दिव्य शक्तियां उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट को टाल देती हैं और उसे सुख, शांति व अभय का वरदान देती हैं।

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