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Burj Khalifa Engineering Secrets: रेगिस्तान की रेतीली जमीन पर कैसे खड़ी है 828 मीटर ऊंची बुर्ज खलीफा? जानिए इंजीनियरिंग का कमाल

Burj Khalifa Engineering Secrets: रेगिस्तान की रेतीली जमीन पर कैसे खड़ी है 828 मीटर ऊंची बुर्ज खलीफा? जानिए इंजीनियरिंग का कमाल

रेगिस्तान की रेतीली जमीन पर कैसे खड़ी है 828 मीटर ऊंची बुर्ज खलीफा? जानिए इंजीनियरिंग का कमाल

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AAmandeep Singh

Burj Khalifa Engineering Secrets: दुबई का नाम लेते ही जेहन में सबसे पहले आसमान से बातें करती बुर्ज खलीफा की तस्वीर उभरती है। 828 मीटर की ऊंचाई और 163 मंजिलों वाला यह टावर आज दुनिया की सबसे ऊंची इमारत है। दूर से देखने पर यह किसी चमकीले शीशे के मीनार जैसी प्रतीत होती है, लेकिन इसके पीछे छिपी इंजीनियरिंग की कहानी किसी रोमांचक दास्तान से कम नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल यही था कि जिस रेगिस्तानी जमीन पर पैर रखते ही रेत धंसने लगती है, वहां इतनी भारी-भरकम इमारत की नींव आखिर कैसे टिकाई गई? साथ ही, आसमान की बुलंदियों पर चलने वाली तेज हवाएं और 50 डिग्री तक का तापमान भी बहुत बड़ी बाधा थीं, जिन्हें इंजीनियरों ने अपनी सूझबूझ से मात दी।

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रेत और घर्षण का कमाल: ऐसे तैयार हुई बुर्ज खलीफा की मजबूत नींव

किसी भी इमारत की ताकत उसकी नींव में छिपी होती है, और बुर्ज खलीफा के मामले में यह चुनौती सबसे कठिन थी। दुबई की जमीन पूरी तरह रेतीली है, इसलिए इतनी विशालकाय इमारत का वजन संभालना सामान्य तरीकों से मुमकिन नहीं था। इस समस्या से पार पाने के लिए इंजीनियरों ने जमीन के अंदर 192 मजबूत कंक्रीट पाइल्स उतारे, जिनकी गहराई करीब 43 मीटर तक थी।

दिलचस्प बात यह है कि ये पाइल्स किसी कठोर चट्टान पर नहीं टिके हैं, बल्कि रेत और कंक्रीट के बीच होने वाले घर्षण (फ्रिक्शन) के बल पर पूरी इमारत का वजन संभालते हैं। इन पाइल्स के ऊपर करीब 3.7 मीटर मोटी कंक्रीट की एक विशाल परत डाली गई, जिसे ‘मैट फाउंडेशन’ कहा जाता है। इसका मुख्य काम इमारत के अरबों टन वजन को नींव के हर हिस्से में बराबर बांटना था, ताकि जमीन एक तरफ से धंसे नहीं।

‘वाई’ आकार का डिजाइन और हवा के थपेड़ों से मुकाबला

जितनी ऊंची इमारत होती है, उस पर हवा का दबाव उतना ही खतरनाक रूप से बढ़ता है। अगर हवा का रुख लगातार एक ही दिशा में बना रहे, तो कोई भी ऊंचा टावर हिलकर ढह सकता है। इस खतरे से निपटने के लिए बुर्ज खलीफा को ‘वाई’ (Y) आकार में ढाला गया।

जैसे-जैसे यह टावर आसमान की तरफ ऊपर उठता है, इसकी बनावट में करीने से बदलाव आते जाते हैं, जिससे हवा का बहाव टूट जाता है और भंवर एक जगह टिक नहीं पाते। इस तकनीक को ‘बट्रेस्ड कोर सिस्टम’ कहा जाता है, जहां बीच का मुख्य हिस्सा रीढ़ की हड्डी की तरह काम करता है और तीन विंग्स इसे मजबूत सहारा देते हैं। इसी नायाब डिजाइन के कारण यह इमारत रेगिस्तान की आंधी और तेज हवाओं को आसानी से झेल लेती है।

50 डिग्री की तपिश में बर्फ से तैयार हुआ कंक्रीट और अनोखा स्पायर

दुबई की भीषण गर्मी में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस को छू लेता है। इतनी गर्मी में सामान्य कंक्रीट जल्दी सूखकर चटक जाता, जिससे इमारत कमजोर हो सकती थी। इस मुश्किल का हल निकालने के लिए कंक्रीट के घोल में बर्फ मिलाई जाती थी, ताकि तापमान नियंत्रित रहे और वह धीरे-धीरे अपनी मजबूती पकड़े।

इसके अलावा, कंक्रीट को 606 मीटर की रिकॉर्ड ऊंचाई तक पंप करने के लिए अत्याधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया गया। बात यहीं खत्म नहीं होती, सबसे ऊपरी हिस्से पर लगने वाले ‘स्पायर’ यानी नुकीले ढांचे को क्रेन से उठाना असंभव था। ऐसे में इंजीनियरों ने उसे अंदर ही असेंबल कर हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से टेलिस्कोप की तरह धीरे-धीरे ऊपर धकेल दिया, जिसने इस निर्माण को इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया।

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