Garba history: शारदीय नवरात्रि के इन पावन दिनों में देश के कोने-कोने में मां दुर्गा के जयकारों के साथ ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरकते लोगों के कदम नजर आते हैं। उपवास और पूजा-पाठ के इस पर्व में ‘गरबा’ का विशेष स्थान है। मूल रूप से गुजरात की माटी से जुड़ा यह लोकनृत्य आज केवल एक राज्य या उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति और स्त्री शक्ति की आराधना का सबसे जीवंत रूप बन चुका है। गोल घेरे में तालियों की थाप के साथ घूमते नर्तक उत्सव के उल्लास को एक अलग ही ऊंचाई पर ले जाते हैं।
क्या है गरबा और इसका धार्मिक आधार?
गरबा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के शब्द ‘गर्भदीप’ से मानी जाती है। इसका सीधा संबंध उस विशेष मिट्टी के घड़े (गरबी) से होता है, जिसमें कई छोटे-छोटे छेद किए जाते हैं और उसके भीतर एक प्रज्ज्वलित दीपक रखा जाता है। धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह घड़ा मानव शरीर का प्रतीक है, जबकि इसके भीतर जलने वाली ज्योति को जीव यानी आत्मा माना जाता है। प्राचीन काल में महिलाएं अपने घरों और मंदिरों में शक्ति स्वरूपी मां की स्थापना कर इसी दीपक के चारों ओर भजन-कीर्तन करती थीं और नृत्य के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करती थीं।
क्यों बनाया जाता है गोल घेरा?
गरबा की सबसे बड़ी विशेषता इसका वृत्ताकार यानी गोल घेरा होता है। इसमें भाग लेने वाले लोग एक निश्चित लय और ताल के साथ गोल घूमते हैं। सांस्कृतिक जानकारों के अनुसार, यह गोल दायरा इस ब्रह्मांड के निरंतर चलने वाले चक्र, समय के प्रवाह और देवी शक्ति की अनंतता को दर्शाता है। नृत्य के दौरान प्रत्येक व्यक्ति अपनी धुरी पर घूमते हुए भी उस बड़े सामूहिक दायरे से जुड़ा रहता है, जो समाज में आपसी तालमेल, भाईचारे और समरसता का संदेश देता है। धीमी गति से शुरू होने वाला यह नृत्य समय के साथ ढोल की तेज गूंज के साथ रोमांचक हो जाता है।
राजघरानों से निकलकर वैश्विक पटल पर पहुंचा गरबा
गरबा की जड़ें गुजरात के ग्रामीण इलाकों, किसानों और वहां के ऐतिहासिक राजघरानों की परंपराओं से गहराई से जुड़ी हैं। लोक मान्यताओं में इसका गहरा संबंध भगवान कृष्ण की रासलीला और बृज की संस्कृति से भी जोड़ा जाता है। समय के साथ इस कला में कई बदलाव आए। पहले यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं तक ही सीमित था, जो लोकगीतों के जरिए संस्कृति की इस थाती को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाती थीं। हालांकि, आज के दौर में यह हर वर्ग और आयु के लोगों के लिए उत्सव का मुख्य आकर्षण बन चुका है, जिसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में भी स्थान मिल चुका है।
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