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Jagannath Puri: क्यों इस मंदिर में एकादशी के दिन भी जमकर खाया जाता है चावल का महाप्रसाद?

Jagannath Puri: क्यों इस मंदिर में एकादशी के दिन भी जमकर खाया जाता है चावल का महाप्रसाद?

पुरी जगन्नाथ मंदिर में एकादशी के दिन भी चावल का महाप्रसाद क्यों खाया जाता है

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GGaganpreet Kaur

Jagannath Puri: सनातन धर्म में आस्था और भक्ति के सबसे बड़े केंद्रों में से एक उड़ीसा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की महिमा निराली है. माना जाता है कि महाप्रभु जगन्नाथ के चौखट पर शीश नवाने मात्र से ही इंसान के जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल जाती है. ज्योतिष और धर्म में विश्वास रखने वाले तो यहां तक मानते हैं कि जगन्नाथ जी के दर्शन मात्र से कुंडली के सोए हुए ग्रह भी अनुकूल हो जाते हैं. लेकिन इस चमत्कारिक धाम की अपनी कुछ ऐसी अनूठी परंपराएं भी हैं, जो सदियों से कौतूहल और चर्चा का विषय रही हैं. इन्हीं में से एक बेहद दिलचस्प रहस्य है कि जगन्नाथ मंदिर में एकादशी देवी उल्टी लटकी हुई हैं और यहां देश के अन्य हिस्सों की तरह एकादशी पर चावल खाने की मनाही नहीं है.

जहां देश भर में चावल वर्जित, वहां पुरी में बंटता है अन्न का महाप्रसाद

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हिंदू कैलेंडर और संस्कृति में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है. इस दिन अन्न, विशेषकर चावल का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है और व्रत रखने की कड़े नियम हैं. मगर जगन्नाथ पुरी की फिजां में आते ही ये नियम बदल जाते हैं. यहां एकादशी के दिन भी भगवान जगन्नाथ को छप्पन भोग में चावल चढ़ाया जाता है और मंदिर आने वाले भक्तों को प्रसाद के रूप में चावल ही वितरित होता है. स्थानीय पंडितों और जानकारों के मुताबिक, जगन्नाथ धाम में एकादशी के दिन महाप्रसाद के रूप में चावल ग्रहण करना पाप नहीं, बल्कि परम पुण्य का काम माना जाता है. इसके पीछे एक बड़ी ही रोचक और पौराणिक लोककथा छिपी हुई है.

जब ब्रह्मा जी ने कुत्ते के साथ बैठकर खाया प्रसाद, तो प्रकट हुईं एकादशी देवी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी भगवान जगन्नाथ के महाप्रसाद का स्वाद चखने के लिए धरती पर पुरी धाम पधारे. जब वे मंदिर के गर्भगृह के समीप पहुंचे, तो उस दिन का महाप्रसाद पूरी तरह समाप्त हो चुका था. ब्रह्मा जी ने जब नजर दौड़ाई तो देखा कि कोने में फेंके गए एक पत्ते पर बासी चावल के कुछ दाने बचे रह गए थे, जिसे एक कुत्ता खा रहा था. महाप्रभु के प्रति अगाध श्रद्धा के वशीभूत होकर ब्रह्मा जी ने बिना किसी संकोच या छुआछूत के, उसी कुत्ते के साथ बैठकर पत्ते से चावल के दाने उठाने शुरू कर दिए. ठीक उसी क्षण वहां एकादशी देवी प्रकट हो गईं. उन्होंने ब्रह्मा जी को टोकते हुए कहा कि आज एकादशी तिथि है और इस दिन चावल खाना व्रत के नियमों की घोर अवहेलना है.

नियमों से ऊपर उठी श्रद्धा: भगवान ने मंदिर के पीछे एकादशी को लटकाया उल्टा

जैसे ही एकादशी देवी ने ब्रह्मा जी के सामने नियमों की दुहाई दी, स्वयं भगवान जगन्नाथ वहां प्रकट हो गए. महाप्रभु ने एकादशी देवी को समझाते हुए कहा कि जहां निष्काम और निश्छल भक्ति होती है, वहां कागज पर लिखे नियमों से कहीं ज्यादा मूल्य भक्त की आंतरिक श्रद्धा का होता है.

इसके साथ ही भगवान ने त्रिलोक में यह घोषणा कर दी कि उनके महाप्रसाद पर दुनिया का कोई भी व्रत, उपवास या तिथि का बंधन कभी प्रभावी नहीं होगा. कहा जाता है कि इसी घटना के बाद भगवान ने एकादशी देवी के अहंकार को शांत करने के लिए उन्हें मंदिर के पीछे उल्टा लटका दिया था. तभी से आज तक पुरी में एकादशी के दिन भी बड़ी ही श्रद्धा के साथ चावल का महाप्रसाद ग्रहण किया जाता है.

अनुभवी बुजुर्ग और संत इस कथा को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं. जगन्नाथ धाम यह संदेश देता है कि भगवान को आडंबर और कठोर नियमों से नहीं, बल्कि शुद्ध अंतःकरण से रिझाया जा सकता है. इसके साथ ही महाप्रसाद को लेकर एक और जरूरी मर्यादा सदियों से चली आ रही है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के इस दिव्य अन्न को कभी भी चलते-फिरते या खड़े होकर नहीं खाना चाहिए. महाप्रसाद का असली आदर तभी है जब इसे पूरी कृतज्ञता के साथ जमीन पर बैठकर ग्रहण किया जाए.

यह भी पढ़ें–त्रयोदशी तिथि पर शिव जी के साथ क्यों होती है कामदेव की पूजा? जानिए इसके पीछे का छिपा धार्मिक रहस्य

(Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। Jagmarg News किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है।)

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