Kullu Dussehra 2026: अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव की छठी सांस्कृतिक संध्या सोमवार रात पंजाबी सूफी गायक सतिंदर सरताज के नाम रही। लाल चंद प्रार्थी कला केंद्र में उनकी प्रस्तुति देखने और आवाज सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। भीड़ इतनी अधिक थी कि दर्शकों के लिए बैठने की जगह तो दूर, खड़े होने की जगह भी नहीं बची। कई लोगों को प्रवेश नहीं मिलने के कारण निराश होकर लौटना पड़ा। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। सतिंदर सरताज ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय लोकगीत ‘माए नी मेरिए, शिमले दी राहें’ से की। इसके बाद उन्होंने पंजाबी और सूफियाना गीतों की ऐसी महफिल सजाई कि दर्शक देर रात तक संगीत का आनंद लेते रहे। उनकी प्रस्तुति में हिंदी, सूफी और पंजाबी गीतों का संगम देखने को मिला।
कुल्लू-मनाली की प्राकृतिक खूबसूरती से प्रभावित सरताज ने कहा कि पंजाब के बाद उन्होंने ऐसा नजारा पहली बार देखा है। उन्होंने हिमाचल और पंजाब की संस्कृति तथा नृत्य परंपराओं को एक-दूसरे के करीब बताया। कुल्लू, मनाली और आसपास के क्षेत्रों से पहुंचे संगीत प्रेमियों में उनके कार्यक्रम को लेकर जबरदस्त उत्साह रहा। कला केंद्र के भीतर जगह नहीं मिलने के कारण कुछ दर्शकों को बाहर से ही लौटना पड़ा। सतिंदर सरताज की प्रस्तुति ने उत्सव की छठी सांस्कृतिक संध्या को खास बना दिया। सात दिवसीय महापर्व के अंतिम चरण में उनकी सूफियाना शाम ने संगीत प्रेमियों को यादगार अनुभव दिया।
आज लंका दहन के साथ संपन्न होगा सात दिवसीय कुल्लू दशहरा
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का मंगलवार को अंतिम दिन है। सात दिवसीय महापर्व का समापन ब्यास नदी के किनारे लंका बेकर के पास पारंपरिक लंका दहन की रस्म के साथ होगा। कुल्लू दशहरे की यह परंपरा देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरे से अलग है। यहां रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के बड़े-बड़े पुतले नहीं जलाए जाते, बल्कि सूखी लकड़ियों और घास के ढेर को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर लंका दहन की रस्म निभाई जाती है। इस आयोजन में भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा का विशेष महत्व है। भगवान रघुनाथ जी अपने भव्य रथ में सवार होकर लंका दहन स्थल तक पहुंचेंगे। घाटी के विभिन्न क्षेत्रों से दशहरा उत्सव में शामिल होने आए देवी-देवता और उनके देवलू भी इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे। लंका दहन के साथ उत्सव के समापन की रस्में पूरी होंगी।
अंतिम दिन की रस्मों के बाद भगवान रघुनाथ जी और घाटी के देवी-देवताओं की विदाई शुरू होगी। सात दिनों तक ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में देव परंपराओं का निर्वहन करने और भगवान रघुनाथ जी के दरबार में हाजिरी भरने के बाद देवी-देवता अपने-अपने मूल स्थानों की ओर लौटेंगे। कुछ देवी-देवताओं के मंगलवार सुबह रवाना होने की संभावना है। उनके लौटने के साथ ही ढालपुर मैदान में सात दिनों तक दिखाई देने वाली देव संस्कृति और आस्था की अनूठी छटा अपने समापन की ओर बढ़ेगी।
मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर नजर, शाम को सजेगी कुल्लवी नाइट
दशहरा उत्सव के समापन अवसर पर मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की घोषणाओं को लेकर भी उत्सुकता बनी हुई है। खासकर देवी-देवताओं के नजराने, बजंतरियों के मानदेय और देव समाज से जुड़े दूसरे विषयों पर संबंधित वर्ग सरकार से उम्मीद लगाए बैठे हैं। गुर संघ, पुजारी संघ और बजंतरी यह देखना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री उनके लिए क्या घोषणा करते हैं। कुल्लू दशहरा केवल सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं, बल्कि घाटी की देव परंपराओं और स्थानीय समाज की आस्था से भी जुड़ा है। ऐसे में देव समाज से जुड़े विषयों पर होने वाली घोषणाओं को अहम माना जा रहा है। हालांकि, मुख्यमंत्री की ओर से किसी विशेष घोषणा की पुष्टि नहीं हुई है।
उधर, उत्सव की अंतिम सांस्कृतिक संध्या में कुल्लवी नाइट का आयोजन होगा। इसमें कुल्लवी लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और पहाड़ी गीतों की प्रस्तुतियों के जरिए हिमाचल की सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिलेगी। सतिंदर सरताज की सूफियाना शाम के बाद अब दर्शकों की निगाहें स्थानीय कलाकारों और लोक संगीत की प्रस्तुतियों पर रहेंगी। लंका दहन, देवी-देवताओं की विदाई और कुल्लवी नाइट के साथ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का समापन होगा।
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