Navratri Kanya Pujan: सनातन परंपरा में नवरात्रि केवल व्रत और उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मातृशक्ति के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट करने का पावन अवसर भी है। महाअष्टमी और महानवमी के दिन घर-घर में निभाई जाने वाली कन्या पूजन की परंपरा इसी आस्था का केंद्र बिंदु है। इस वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर (रविवार) से हो रही है, जिसका समापन 19 अक्टूबर को नवमी तिथि के साथ होगा। शास्त्रों में छोटी कन्याओं को साक्षात मां जगदम्बा का रूप मानकर उनके चरण पखारने और उन्हें जिमाने का विधान है। हालांकि, अक्सर श्रद्धालुओं के मन में यह उलझन रहती है कि कन्या पूजन में कितनी बच्चियों को बुलाना चाहिए और इसके क्या धार्मिक नियम हैं।
9 कन्याओं का ही क्यों है विशेष महत्व? जानिए कम संख्या का विकल्प
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कन्या पूजन में 9 कन्याओं को भोजन कराना सबसे उत्तम और पूर्ण फलदायी माना गया है। ये 9 कन्याएं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुशमांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—का प्रतीक होती हैं। हालांकि, आज की आपाधापी और व्यस्त जीवनशैली में यदि एक साथ 9 कन्याएं उपलब्ध न हो पाएं, तो शास्त्रों में इसका भी सहज समाधान है। आप श्रद्धाभाव से 2, 3, 5 या 7 कन्याओं को भी आमंत्रित कर सकते हैं। यदि केवल एक कन्या भी मिले, तो उसे भी भक्तिभाव से पूजने पर उतना ही पुण्य फल मिलता है।
कन्या पूजन के लिए क्या होनी चाहिए बच्चियों की उम्र?
कुमारी पूजा में आयु सीमा का विशेष ध्यान रखा जाता है। शास्त्रों के अनुसार 2 से 10 वर्ष की कन्याओं का ही पूजन करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 2 वर्ष की कन्या को ‘कुमारी’, 3 वर्ष की को ‘त्रिमूर्ति’, 4 वर्ष की को ‘कल्याणी’, 5 वर्ष की को ‘रोहिणी’, 6 वर्ष की को ‘कालिका’, 7 वर्ष की को ‘चंडिका’, 8 वर्ष की को ‘शांभवी’, 9 वर्ष की को ‘दुर्गा’ और 10 वर्ष की कन्या को ‘सुभद्रा’ स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि 10 वर्ष से अधिक उम्र की कन्याओं को रजस्वला होने की संभावना के कारण पूजा में शामिल नहीं किया जाता।
लांगुरिया (भैरव) के बिना अधूरा माना जाता है पूजन
कन्या पूजन के दौरान नौ देवियों के साथ एक छोटे बालक को भी आमंत्रित करने का विधान है। इस बालक को ‘लांगुरिया’ या ‘भैरव बाबा’ का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, मां दुर्गा की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती जब तक कि उनके साथ उनके रक्षक भैरव की पूजा न की जाए। इसलिए कन्या भोज के समय लांगुरिया को भी भोजन कराना अनिवार्य अंग माना गया है।
सही विधि से करें स्वागत: चरण पखारने से लेकर दक्षिणा तक
कन्या पूजन वाले दिन सबसे पहले घर और रसोई की पूर्ण स्वच्छता सुनिश्चित करें। जब कन्याएं घर आएं तो उनका सादर अभिवादन करें और सबसे पहले साफ जल से उनके पैर धोएं। इसके बाद उन्हें स्वच्छ आसन पर बैठाएं। उनके माथे पर कुमकुम और रोली का तिलक लगाएं, अक्षत लगाएं और कलाई पर कलावा बांधें। इसके बाद मां दुर्गा का भोग सिद्ध करके तैयार किया गया पारंपरिक प्रसाद—सूजी का हलवा, भुने हुए काले चने और पूरी—उन्हें आदरपूर्वक परोसें। भोजन कराने के उपरांत अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा, फल, उपहार या पठन-पाठन की सामग्री भेंट करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें।
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