Lord Ram: श्रीराम के बल और तेज का रहस्य, जानिए राजमहल से वनवास तक क्या खाते थे भगवान राम?
राजमहल से वनवास तक क्या खाते थे भगवान राम?
Lord Ram: त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अनुकरणीय है, बल्कि उनका शारीरिक सौष्ठव, असीम बल और चेहरे का तेज भी अद्भुत था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि प्रभु राम का खान-पान कैसा था, जो उन्हें हर परिस्थिति में इतना ऊर्जावान और संयमित बनाए रखता था? वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस जैसे पवित्र ग्रंथों में भगवान राम के भोजन और दिनचर्या का बेहद सुंदर वर्णन मिलता है।
राजमहल के छप्पन भोग से लेकर 14 वर्षों के कठिन वनवास तक, श्रीराम का आहार हमेशा सात्विकता और प्रकृति के संतुलन से जुड़ा रहा।
राजमहल का भोजन: कनक थाली में स्वादिष्ट व्यंजन और सात्विक मिष्ठान
रामचरितमानस के बालकांड में तुलसीदास जी ने अयोध्या के राजमहल में भोजन के दृश्य का वर्णन करते हुए लिखा है:
कनक थार सूचि सुंदर थारी। बिप्र बृंद जिमि जेवहिं भारी॥
अति बिचित्र बहु भांति रसोई। जाहि न जाइ बखानी सोई॥
अयोध्या के राजभवन में भगवान राम और उनके तीनों भाइयों (भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न) को सोने की सुंदर थालियों में अत्यंत स्वादिष्ट और शुद्ध भोजन परोसा जाता था। ग्रंथों के अनुसार, राजमहल में चावल के मालपुए, मोदक, दूध की खीर, खिचड़ी, तिल और दूध से बनी मिठाइयां तथा ताजे गो-रस (दूध, दही, मक्खन और शुद्ध घी) का उपयोग मुख्य रूप से होता था। इसके अलावा त्रेतायुग के प्रमुख फलों में आम, केला, अनार, नारियल, गन्ना, कटहल और जामुन का रस भी भोजन का हिस्सा था।
वनवास में ‘हविष्यान्न’ और कंद-मूल बना ऊर्जा का आधार
वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में प्रभु राम स्वयं माता कौशल्या और अयोध्यावासियों को अपने 14 वर्षों के वनवासी जीवन और खान-पान की जानकारी देते हुए कहते हैं:
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने।
मधुमूलफलैर्जीवन् हविषेण च राघवो॥
अर्थात, वन में वे शहद, कंद-मूल, फल और हविष्यान्न खाकर ही जीवन व्यतीत करेंगे। जब श्रीराम माता शबरी के आश्रम पहुंचे, तो शबरी ने भी उन्हें अत्यंत रसीले और मीठे कंद-मूल व फल ही प्रेम से भेंट किए थे, जिन्हें प्रभु ने बार-बार सराहकर खाया।
क्या होता है हविष्यान्न, जिसने राम को दिया असीम तेज?
आज के दौर में लोग प्रोसेस्ड फूड और तेल-मसालों से बीमारियों को न्योता दे रहे हैं, जबकि त्रेतायुग में ऋषि-मुनियों और श्रीराम का मुख्य आधार हविष्यान्न था। हविष्यान्न वह अति पवित्र और प्राकृतिक अन्न होता है, जिसका उपयोग हवन और यज्ञ में आहुति देने के लिए किया जाता है।
क्या-क्या शामिल था: इसमें बिना पॉलिश का धान, जौ, गेहूं, मूंग दाल, हरा मटर, तिल, गाय का शुद्ध दूध-घी, शकरकंद, अरबी, हरी सब्जियां, सेंधा नमक और गन्ना शामिल होते थे।
बनाने का तरीका: इसे पकाने के लिए तेल, लहसुन, प्याज या किसी रासायनिक मिलावट का इस्तेमाल नहीं होता था। इसे मिट्टी या पीतल के बर्तनों में पकाया जाता था।
स्वास्थ्य विज्ञान के नजरिए से देखें तो हविष्यान्न और प्राकृतिक कंद-मूल पाचन तंत्र को मजबूत रखते हैं, शरीर में त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को संतुलित करते हैं और मन में सात्विक गुणों व विचारों का संचार करते हैं। यही वजह थी कि कठिन से कठिन परिस्थितियों और युद्ध के मैदान में भी भगवान राम का तेज और बल सदैव पराकाष्ठा पर रहा।
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