Devshayani Ekadashi: 25 जुलाई को रखा जाएगा देवशयनी एकादशी व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पारण का समय
25 जुलाई को रखा जाएगा देवशयनी एकादशी व्रत
Devshayani Ekadashi: सनातन धर्म में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है। इस एकादशी को ‘देवशयनी एकादशी’ या ‘हरिशयनी एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन से जगत के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा के लिए चले जाते हैं और अगले चार महीनों के लिए मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इस वर्ष देवशयनी एकादशी का व्रत 25 जुलाई, शनिवार को पूर्ण विधि-विधान के साथ रखा जाएगा।
शास्त्रों में निहित है कि इस दिन व्रत रखकर श्रीहरि की उपासना करने और सतयुग से चली आ रही पारंपरिक व्रत कथा को सुनने से साधक के सभी जन्मों के पाप कट जाते हैं तथा जीवन के अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का समय
पंचांग गणना के अनुसार, आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत 24 जुलाई को सुबह 09:12 बजे हो रही है, जिसका समापन 25 जुलाई को सुबह 11:34 बजे होगा। उदयातिथि की मान्यता के अनुसार व्रत 25 जुलाई को ही रखा जाएगा।
ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, इस बार यह व्रत अति शुभ ब्रह्म योग और ज्येष्ठा नक्षत्र के दुर्लभ संयोग में आ रहा है। व्रत का पारण अगले दिन यानी 26 जुलाई, रविवार को सुबह 05:39 बजे से 08:22 बजे के बीच किया जाएगा।
देवशयनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ शुक्ल एकादशी के महात्म्य और उसकी कथा के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें वही कथा सुनाई जो ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को बताई थी।
कथा के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम के एक महान और चक्रवर्ती सम्राट हुए। वे अपनी प्रजा को संतान की भांति प्रेम करते थे और उनके राज्य में हर तरफ खुशहाली थी। परंतु, एक समय ऐसा आया जब उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक बूंद भर बारिश नहीं हुई और भयंकर अकाल पड़ गया। वर्षा न होने के कारण यज्ञ, हवन, पूजा-पाठ और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान ठप हो गए और प्रजा में हाहाकार मच गया।
अंगिरा ऋषि का आश्रम और अकाल से मुक्ति का उपाय
प्रजा का दुख देखकर राजा मांधाता अत्यंत व्यथित हुए। वे इस अकाल का कारण और निवारण ढूंढने के लिए अपनी सेना के साथ घने जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में भ्रमण करते हुए वे महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे। राजा ने ऋषिवर को साष्टांग प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि वे पूर्ण निष्ठा से धर्म का पालन करते हैं, फिर भी उनकी प्रजा इस भीषण कष्ट को झेल रही है।
महर्षि अंगिरा ने राजा को ढांढस बंधाया और कहा, “हे राजन! सतयुग में सूक्ष्म पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। इस संकट से उबरने का एक ही अमोग उपाय है—आप अपनी प्रजा सहित आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवशयनी एकादशी का पूर्ण नियमपूर्वक व्रत रखें, भगवान विष्णु का पूजन करें और रात्रि में जागरण करें।”
व्रत के पुण्य प्रभाव से राज्य में हुई मूसलाधार बारिश
महर्षि अंगिरा का परामर्श मानकर राजा मांधाता अपने महल लौटे। उन्होंने आषाढ़ शुक्ल एकादशी आने पर पूरे विधि-विधान से व्रत रखा, श्रीहरि की पूजा-अर्चना की और द्वादशी के दिन दान-पुण्य कर पारण किया।
इस महान व्रत के पुण्य-प्रताप से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और संपूर्ण राज्य में झमाझम बारिश शुरू हो गई। देखते ही देखते 3 साल से पड़ा अकाल समाप्त हो गया, धरती हरी-भरी हो गई और राजा मांधाता का राज्य पुनः धन-धान्य और सुख-समृद्धि से परिपूर्ण हो गया।
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