July 13, 2026

Automobile News: पेट्रोल के बाद अब डीजल की बारी, सरकार ला रही है 15% आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग का महाप्लान

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Automobile News: पेट्रोल के बाद अब डीजल की बारी, सरकार ला रही है 15% आइसोब्यूटेनॉल ब्लेंडिंग का महाप्लान

कच्चे तेल के आयात पर लगेगी लगाम, 2027 से डीजल में अनिवार्य हो सकता है नया बायोफ्यूल

Automobile News: देश के परिवहन क्षेत्र को प्रदूषण मुक्त बनाने और कच्चे तेल के आयात पर अरबों डॉलर की निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार अब एक बेहद क्रांतिकारी कदम उठाने की दहलीज पर खड़ी है।

ई-20 (पेट्रोल में 20% एथेनॉल) की सफलता से उत्साहित होकर, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने अब डीजल गाड़ियों के लिए बड़ा प्लान तैयार किया है। सरकार जल्द ही डीजल में 15 प्रतिशत तक ‘आइसोब्यूटेनॉल’ मिलाने की तैयारी कर रही है। चूंकि भारत में पेट्रोल के मुकाबले डीजल की खपत लगभग दोगुनी है, इसलिए सरकार का यह कदम देश के ऊर्जा समीकरण को पूरी तरह बदलकर रख सकता है।

एथेनॉल क्यों हुआ फेल और क्यों चुना गया ‘आइसोब्यूटेनॉल’?

शुरुआती दिनों में वैज्ञानिकों ने एथेनॉल को सीधे डीजल में मिलाने का प्रयास किया था, लेकिन वे प्रयोग तकनीकी रूप से नाकाम रहे। दरअसल, एथेनॉल और डीजल का रासायनिक तालमेल नहीं बैठ पाता, जिससे इंजन में खराबी आने का खतरा बढ़ जाता है। इस तकनीकी गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार ने एथेनॉल से ‘आइसोब्यूटेनॉल’ बनाने की तकनीक पर ध्यान केंद्रित किया।

आइसोब्यूटेनॉल एक उच्च गुणवत्ता वाला बायोफ्यूल है, जो बिना किसी झंझट के डीजल के साथ घुलमिल जाता है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक कार्यक्रम के दौरान स्पष्ट किया था कि आइसोब्यूटेनॉल आने वाले समय में पारंपरिक डीजल का एक बेहतरीन और स्वच्छ विकल्प साबित होगा।

ट्रायल की टाइमलाइन: एआरएआई और ऑटो कंपनियों ने कसी कमर

इस दिशा में कागजी कार्रवाई और प्रयोगशाला के परीक्षण तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। साल 2025 में ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) ने 10 प्रतिशत ब्लेंडिंग को लेकर एक विस्तृत अध्ययन शुरू किया था, जिसके परिणाम काफी उत्साहजनक रहे।

इसके बाद अब साल 2026 में देश की बड़ी तेल विपणन कंपनियां जैसे HPCL, BPCL और तकनीकी साझेदार प्राज इंडस्ट्रीज (Praj Industries) के साथ मिलकर टाटा मोटर्स जैसी दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनी एक बड़ा कदम उठाने जा रही है। वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (Q2 FY2027) से देश में 2 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल-डीजल ब्लेंड के जमीनी कमर्शियल ट्रायल्स शुरू होने जा रहे हैं।

क्या हैं इसके फायदे और कहां फंसा है पेंच?

तकनीकी विशेषज्ञों की मानें तो आइसोब्यूटेनॉल के इस्तेमाल से आम उपभोक्ताओं और पर्यावरण दोनों को बड़ा फायदा होगा:

बेहतर माइलेज और कम संक्षारण: एथेनॉल के मुकाबले इसकी ‘एनर्जी डेंसिटी’ काफी ज्यादा होती है, जिससे गाड़ी के माइलेज पर कोई खास नकारात्मक असर नहीं पड़ता। साथ ही, यह प्रकृति में कम संक्षारक (Less Corrosive) है, जिससे गाड़ी के इंजन, फ्यूल पाइपलाइन और स्टोरेज टैंक में जंग लगने का खतरा नहीं रहता।

किसानों की चांदी और स्वच्छ हवा: इस तकनीक से जहां एक तरफ वाहनों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन काफी हद तक कम होगा, वहीं एथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल की बढ़ती मांग के कारण देश के अन्नदाता (किसानों) को अपनी फसलों का अतिरिक्त दाम मिलेगा।

चुनौतियां भी कम नहीं:

हालांकि, इस राह में कुछ शुरुआती अड़चनें भी हैं। बड़े पैमाने पर आइसोब्यूटेनॉल का उत्पादन करने के लिए देश में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी, जिसमें भारी-भरकम निवेश की दरकार है। इसके अलावा, शुरुआती फेज में पुराने वाहनों के माइलेज में आंशिक गिरावट की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सरकार की योजना साल 2027 से इस ब्लेंडिंग को चरणबद्ध तरीके से अनिवार्य करने की है, जो भारत को वैश्विक स्तर पर डीजल-बायोफ्यूल प्रोग्राम का नेतृत्व करने वाला पहला देश बना सकता है।

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