July 15, 2026

Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथयात्रा 16 जुलाई से, कौन हैं भगवान जगन्नाथ की मौसी? जानिए गुंडिचा मंदिर से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं

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Jagannath Rath Yatra: जगन्नाथ रथयात्रा 16 जुलाई से, कौन हैं भगवान जगन्नाथ की मौसी? जानिए गुंडिचा मंदिर से जुड़ी दो पौराणिक कथाएं

सिर्फ साल में 7 दिन खुलता है यह अनोखा मंदिर

Jagannath Rath Yatra: ओडिशा के पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर से निकलने वाली ऐतिहासिक रथयात्रा को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस बार यह पावन यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार से शुरू होने जा रही है। हर साल की तरह इस बार भी महाप्रभु जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इस भव्य यात्रा का मुख्य गंतव्य गुंडिचा मंदिर होता है, जिसे भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है। यहां भगवान कुछ दिन विश्राम करते हैं और फिर वापस श्रीमंदिर लौटते हैं। लेकिन इस परंपरा के पीछे छिपी ‘मौसी’ की कहानी बेहद दिलचस्प है।

रानी गुंडिचा कैसे बनीं भगवान की मौसी?

पौराणिक इतिहास के मुताबिक, तत्कालीन राजा इंद्रद्युम्न ने पुरी में भव्य श्रीमंदिर का निर्माण तो करवा लिया था, लेकिन मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए जब कोई योग्य पुरोहित नहीं मिला, तो नारद जी की सलाह पर वे ब्रह्मा जी को लाने ब्रह्मलोक चले गए। वहां से लौटने में कई युग बीत जाने थे, इसलिए उनकी पत्नी रानी गुंडिचा ने महल में समाधि लेकर कठिन तप करने का संकल्प लिया। युगों बाद जब राजा ब्रह्मा जी के साथ लौटे, तो मंदिर रेत में दफन हो चुका था और वहां गालु माधव नाम के नए राजा का राज था।

इसी बीच, पति के आगमन का संकेत पाकर रानी गुंडिचा की समाधि भी टूटी। जब ब्रह्मा जी ने विधि-विधान से गर्भगृह में मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की, तो महाप्रभु जगन्नाथ ने रानी गुंडिचा के निस्वार्थ भाव और मां जैसी लंबी प्रतीक्षा से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी मौसी का दर्जा दे दिया। भगवान ने वचन दिया कि वे हर साल उनसे मिलने आएंगे। जिस स्थान पर रानी ने तप किया था, वहीं आज का भव्य गुंडिचा मंदिर स्थित है, जहां भगवान रथयात्रा के दौरान 7 दिन रुकते हैं। खास बात यह है कि पूरे साल में सिर्फ इन्हीं 7 दिनों में इस मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना की जाती है।

पुरी की रक्षक देवी अर्धशोषणी: महाप्रभु की दूसरी मौसी

गुंडिचा रानी के अलावा, पुरी में देवी अर्धशोषणी (जिन्हें अर्धासिनी भी कहा जाता है) का एक प्राचीन मंदिर है, जिन्हें महाप्रभु की दूसरी मौसी माना जाता है। स्कंद पुराण की एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में जब समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पुरी में भयानक बाढ़ आ गई और श्रीमंदिर डूबने की कगार पर पहुंच गया, तब देवी अर्धासिनी ने बाढ़ के आधे पानी को खुद पीकर महाप्रभु के धाम की रक्षा की थी। तभी से उन्हें पुरी की रक्षक देवी और भगवान की मौसी के रूप में पूजा जाता है।

एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब एक बार माता लक्ष्मी नाराज होकर अपने मायके चली गईं, तो श्रीमंदिर में अन्न और धन का संकट खड़ा हो गया। हालात इतने बिगड़े कि जगन्नाथ जी और बलभद्र जी को भिक्षा मांगनी पड़ी, जबकि बहन सुभद्रा अपनी मौसी देवी अर्धशोषणी के घर चली गईं। वहां मौसी ने सुभद्रा का मां की तरह ख्याल रखा। यही वजह है कि आज भी जब रथयात्रा निकलती है, तो भगवान जगन्नाथ का रथ देवी अर्धशोषणी के मंदिर के सामने कुछ देर के लिए जरूर रुकता है, जहां मौसी उन्हें बड़े चाव से प्रसिद्ध ‘पोड़ा पीठा’ (एक पारंपरिक ओड़िया मिष्ठान) का भोग लगाती हैं।

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