July 11, 2026

Ashadha Purnima Date: 28 या 29 जुलाई, जानें किस दिन रखा जाएगा व्रत और कब मनेगी गुरु पूर्णिमा

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Ashadha Purnima Date: 28 या 29 जुलाई, जानें किस दिन रखा जाएगा व्रत और कब मनेगी गुरु पूर्णिमा

नदियों में स्नान का महामुहूर्त: आषाढ़ पूर्णिमा पर इन चीजों का दान करने से दूर होंगे जीवन के सारे कष्ट

Ashadha Purnima Date: भारतीय अध्यात्म और संस्कृति में गुरु को गोविंद यानी साक्षात ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक की वंदना का पर्व ‘गुरु पूर्णिमा’ इस साल 29 जुलाई को देश भर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

आषाढ़ मास की इस पूर्णिमा का धार्मिक और आध्यात्मिक सिंक इतना गहरा है कि इसे सनातन कैलेंडर के सबसे पवित्र दिनों में गिना जाता है। इस दिन शिष्य अपने गुरुओं के चरणों में बैठकर आशीर्वाद लेते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार गुरु-दक्षिणा अर्पित कर कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

पंचांग का गणित: जानें कब से कब तक है पूर्णिमा तिथि

ज्योतिषीय गणना और द्रिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 28 जुलाई 2026 को शाम 06 बजकर 18 मिनट पर हो रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी 29 जुलाई 2026 को रात 08 बजकर 05 मिनट पर होगा।

शास्त्रों में उदयातिथि (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) को सर्वोपरि माना गया है, इसलिए 29 जुलाई, बुधवार को ही गुरु पूजन, पवित्र नदियों में स्नान-दान और व्यास जयंती के अनुष्ठान किए जाएंगे। हालांकि, जो श्रद्धालु कड़ाई से पूर्णिमा का व्रत रखते हैं, वे चंद्रव्यापिनी तिथि के महत्व को देखते हुए 28 जुलाई को ही व्रत का संकल्प लेंगे।

ब्रह्म मुहूर्त से चंद्रोदय तक; नोट कर लें महामुहूर्त और समय

धार्मिक नजरिए से गुरु पूर्णिमा के दिन समय का चक्र बेहद शुभ संयोग बना रहा है।

ब्रह्म मुहूर्त (स्नान के लिए श्रेष्ठ): सुबह 04:46 बजे से 05:30 बजे तक।

विजय मुहूर्त (विशेष कार्य सिद्धि): दोपहर 02:55 बजे से 03:47 बजे तक।

चंद्रोदय का समय: शाम 07:21 बजे।

मान्यता: इस दिन यदि गंगा, यमुना या नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में डुबकी लगाई जाए, तो जीवन के कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। यदि नदियों तक जाना मुमकिन न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान करने से भी समान पुण्य फल मिलता है।

वेदों के रचयिता महर्षि वेदव्यास की जयंती, इसलिए नाम पड़ा ‘व्यास पूर्णिमा’

इस दिन को केवल गुरु वंदना तक सीमित रखना इसके महत्व को कम करना होगा। दरअसल, इसी तिथि को आदिगुरु महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वेदव्यास जी ने ही वेदों का चार भागों में विभाजन किया, महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की और 18 पुराणों का ज्ञान संसार को दिया। उनके इस अप्रतिम योगदान के कारण ही इस दिन को ‘व्यास पूर्णिमा’ के नाम से भी एक विशिष्ट पहचान मिली है।

कैसे करें गुरु पूजन और भगवान विष्णु की आराधना?

इस दिन की पूजा विधि बेहद सरल लेकिन भावप्रधान है। सुबह जल्दी उठकर साफ या पीले वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और आदिगुरु वेदव्यास का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

सत्यनारायण कथा का महत्व: इस दिन घरों में भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना या खुद पढ़ना बेहद कल्याणकारी माना जाता है। भगवान को पंचामृत, कसार (पंजीरी) और पीले फूलों का भोग लगाएं।

गुरु वंदना: अपने गुरु, शिक्षकों या माता-पिता (जिन्हें आप अपना मार्गदर्शक मानते हैं) के पास जाकर उनका आशीर्वाद लें। अगर गुरु शारीरिक रूप से दूर हैं या इस दुनिया में नहीं हैं, तो उनकी मानसिक छवि या तस्वीर के सम्मुख दीप जलाकर प्रणाम करें।

दान की महिमा: इस पावन अवसर पर जरूरतमंदों को अनाज, वस्त्र, छाता, जलपात्र या मौसमी फलों का दान करने से कुंडली के कई दोष शांत होते हैं और घर में समृद्धि आती है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण (व्रत खोलना) किया जाता है।

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