Miri Piri Hospital: मीरी-पीरी मेडिकल कॉलेज विवाद में हाईकोर्ट का नया मोड़, कर्मचारियों की सैलरी फंसी
27 जुलाई को टेकओवर और शाम को हाईकोर्ट से स्टे, जानिए क्या है पूरा विवाद
Miri Piri Hospital: हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के शाहाबाद स्थित प्रसिद्ध मीरी-पीरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर को लेकर चल रहा वर्चस्व का विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में हुए प्रशासनिक घटनाक्रम और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के नए आदेश के बाद मामला एक बार फिर पेंचीदा कानूनी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। इस पूरे अदालती और प्रशासनिक खींचतान का सबसे बुरा असर संस्थान के डॉक्टरों, पैरामेडिकल और प्रशासनिक स्टाफ पर पड़ रहा है, जिन्हें बीते 4 महीनों से वेतन नसीब नहीं हुआ है।
27 जुलाई को टेकओवर का दावा और शाम को ही हाईकोर्ट से आया स्टे
पूरा मामला तब गरमाया जब हरियाणा सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (HSGMC) ने बीते 27 जुलाई को ड्यूटी मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में मीरी-पीरी अस्पताल का आधिकारिक रूप से टेकओवर (कार्यभार नियंत्रण) करने का दावा किया था। हालांकि, उसी दिन शाम को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की डबल बेंच ने वर्ष 2024 में गठित डॉक्टर बोर्ड पर पहले से जारी स्टे (स्थगनादेश) को आगे भी बरकरार रखने का आदेश सुना दिया। इससे पहले मई 2026 में हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने HSGMC के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्टे देने से इनकार कर दिया था, लेकिन डबल बेंच के ताजा आदेश से मामला फिर उलझ गया है।
दोनों कमेटियों के अपने-अपने दावे: किसने किसे सौंपा चार्ज?
हाईकोर्ट के फैसले को लेकर HSGMC और SGPC के बीच तकरार बढ़ गई है:
HSGMC का पक्ष: हरियाणा कमेटी के प्रधान जगदीश सिंह झींडा का कहना है कि हाईकोर्ट का स्टे सिर्फ 2024 के डॉक्टर बोर्ड पर है, न कि संस्थान के प्रशासनिक संचालन पर। उन्होंने कहा कि जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर एक-दो दिन में जून महीने का वेतन जारी कर दिया जाएगा। 72 घंटे के अल्टीमेटम के बाद ही प्रशासन की मौजूदगी में चार्ज लिया गया था।
SGPC और ट्रस्ट का पक्ष: दूसरी तरफ, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और ट्रस्ट के एडवोकेट लवलेश मेहता का तर्क है कि स्टे का सीधा असर प्रबंधन पर पड़ता है और HSGMC कानूनी रूप से संचालन नहीं कर सकती। वहीं, संस्थान के सीईओ डॉ. संदीप इंद्र सिंह चीमा ने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी भी चार्ज ट्रांसफर डॉक्यूमेंट पर दस्तखत नहीं किए हैं, ऐसे में टेकओवर का दावा बेबुनियाद है।
सबसे बड़ा संकट: विरोध की राह पर जाने को मजबूर हुआ अस्पताल स्टाफ
दोनों कमेटियों की राजनीतिक और कानूनी जंग के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर प्रशासन ने चार्ज किसे और किस आधार पर दिलाया? इस प्रशासनिक गतिरोध के चलते सबसे ज्यादा नुकसान अस्पताल के कर्मचारियों को उठाना पड़ रहा है। 4 महीने से वेतन न मिलने की वजह से स्टाफ के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। कर्मचारियों का कहना है कि अगर जल्द ही उनकी बकाया सैलरी खातों में नहीं आई तो वे काम बंद कर उग्र प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे। अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर 2026 में होगी, तब तक संस्थान का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
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