July 10, 2026

Nilokheri Utsav: जब नीलोखेड़ी में 100 वर्षीय बेला राम ने सुनाई 1947 के विभाजन की दास्तां, जिंदा जल गया था 5 सदस्यों का परिवार

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Nilokheri Utsav: जब नीलोखेड़ी में 100 वर्षीय बेला राम ने सुनाई 1947 के विभाजन की दास्तां, जिंदा जल गया था 5 सदस्यों का परिवार

जब नीलोखेड़ी में 100 वर्षीय बेला राम ने सुनाई 1947 के विभाजन की दास्तां

Nilokheri Utsav: इतिहास सिर्फ किताबों के पन्नों में दर्ज तारीखें नहीं होता, बल्कि वह उन बुजुर्गों की झुर्रियों और आंखों की नमी में भी जिंदा रहता है जिन्होंने वक्त के सबसे क्रूर थपेड़ों को अपने सीने पर झेला है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक और रूह को कंपा देने वाला मंजर नीलोखेड़ी के हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान (एचआईआरडी) में देखने को मिला।

आगामी ‘नीलोखेड़ी उत्सव’ की कड़ियों को जोड़ते हुए संस्थान में वरिष्ठ नागरिकों के अनुभवों और भारत विभाजन के काले दौर की स्मृतियों को सहेजने के लिए एक विशेष संवाद गोष्ठी का आयोजन किया गया था। इस चौपाल में जब विभाजन की त्रासदी झेलकर इस शहर के पुनर्निर्माण की नींव रखने वाले पुरोधाओं ने अपनी जुबानी संघर्ष की दास्तां बयां की, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक उठीं और पूरा माहौल गमगीन हो गया।

आंखों के सामने खाक हो गया कुनबा, बेला राम की आपबीती सुन कांप उठी रूह

संवाद का सबसे कारुणिक और भावुक क्षण तब आया, जब शताब्दी पार कर चुके 100 वर्षीय बुजुर्ग बेला राम मंच पर आए। उन्होंने लड़खड़ाती लेकिन बुलंद आवाज में साल 1947 के उस खौफनाक दौर को याद किया, जब देश की आजादी के जश्न के पीछे लाखों परिवारों का लहू बह रहा था। बेला राम ने बताया कि विभाजन के वक्त उनकी उम्र महज 21 साल थी।

वतन की सरहद पार करते हुए उन्होंने अपनी आंखों के सामने अपने ही परिवार के पांच सदस्यों को जिंदा आग की लपटों में जलते देखा था। इस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बेला राम का गला रुंध गया और आंखें भर आईं। उन्होंने रुआंसे स्वर में कहा कि उनके परिवार ने तलवार के दम पर धर्म परिवर्तन स्वीकार करने के बजाय, अपने स्वाभिमान, धर्म और आस्था की रक्षा के लिए हंसते-हंसते बलिदान का रास्ता चुना। उनकी यह मार्मिक आपबीती सुनते ही हॉल में सन्नाटा पसर गया और लोग अपने आंसू नहीं रोक पाए।

बुजुर्ग हमारी सबसे बड़ी धरोहर, इतिहास को संजोना जरूरी: डॉ. वीरेंद्र चौहान

वरिष्ठ नागरिकों की इन अनमोल और दर्दभरी स्मृतियों को सुनने के बाद हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान के निदेशक डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने इस पहल के मायने समझाए। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि किसी भी जीवंत समाज की सबसे बड़ी थाती उसका इतिहास और उस इतिहास को अपनी स्मृतियों में जिंदा रखने वाले ये वरिष्ठ नागरिक हैं।

आज का आधुनिक नीलोखेड़ी जिन बुलंदियों को छू रहा है, उसकी मजबूत नींव इन्हीं बुजुर्गों के त्याग, अथक परिश्रम और विस्थापन के दर्द को भुलाकर किए गए नवनिर्माण पर टिकी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर हमें अपनी आने वाली नस्लों को उनकी जड़ों, संस्कृति और गौरवशाली विरासत से जोड़ना है, तो इन जीवंत अनुभवों का संरक्षण और दस्तावेजीकरण करना समय की सबसे बड़ी मांग है।

“नीलोखेड़ी उत्सव महज नाच-गाने या सांस्कृतिक चकाचौंध का मंच नहीं है। यह अपने अतीत को टटोलने, अपनी ऐतिहासिक विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी को यह बताने का एक गंभीर अभियान है कि यह शहर किस तरह राख से उठकर दोबारा आबाद हुआ था।”

पगड़ी पहनाकर नवाजा सम्मान, संस्मरणों पर बनेगी स्पेशल डॉक्यूमेंट्री

इस गरिमामयी कार्यक्रम में डॉ. चौहान ने परंपरा के अनुसार समाज के इन स्तंभों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए बेला राम, बलराम, भगवान दास सहित सभी पहुंचे हुए बुजुर्गों को पगड़ी पहनाकर सम्मानित किया। उन्होंने एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए बताया कि इन सभी बुजुर्गों के संस्मरणों और साक्षात्कारों को नीलोखेड़ी उत्सव के लिए विशेष रूप से तैयार की जा रही एक ऐतिहासिक डॉक्यूमेंट्री (वृत्तचित्र) में शामिल किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि भविष्य की पीढ़ियां यह जान सकें कि उनके पूर्वजों ने किन विकट परिस्थितियों में इस शहर को सींचा था।

इस मौके पर पार्षद अंजना कुमारी, सुरेंद्र शर्मा समेत क्षेत्र के कई गणमान्य लोग मौजूद रहे, जिन्होंने इस अनूठी पहल की मुक्तकंठ से सराहना की और इसे नीलोखेड़ी की ऐतिहासिक विरासत को जिंदा रखने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताया।

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