पश्चिम बंगाल मदरसा भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सभी याचिकाएं खारिज
पश्चिम बंगाल मदरसा भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, किसी भी याचिका में नहीं मिला आधार
Madrasa Recruitment : पश्चिम बंगाल के सहायता प्राप्त मदरसों में 2015 से 2020 के बीच हुई शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर दायर सभी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी रिट याचिका में ऐसा आधार नहीं मिला, जिससे आगे सुनवाई की जरूरत हो।
पश्चिम बंगाल के सहायता प्राप्त मदरसों में शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की पीठ ने 2015 से 2020 के बीच हुई नियुक्तियों की वैधता को चुनौती देने वाली सभी रिट याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि किसी भी याचिका में ऐसा कानूनी आधार नहीं मिला, जिस पर आगे विचार किया जा सके।
यह मामला उन नियुक्तियों से जुड़ा था, जो उस अवधि में हुई थीं जब मदरसा भर्ती कानून को लेकर कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। इस फैसले के बाद भर्ती प्रक्रिया से जुड़े इस चरण का न्यायिक विवाद समाप्त हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाएं क्यों खारिज कीं?
मामले में कुल 361 आवेदकों ने 40 रिट याचिकाएं दाखिल की थीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहले 13 चयनित मामलों की जांच करने का फैसला लिया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि इन 13 मामलों में नियुक्तियों की वैधता साबित होती है, तभी बाकी मामलों पर भी विचार किया जाएगा।
सोमवार को सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि 13 में से कोई भी याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सका। इसी आधार पर सभी लंबित याचिकाओं को एक साथ खारिज कर दिया गया।
क्या था पूरा विवाद?
यह विवाद पश्चिम बंगाल मदरसा सर्विस कमीशन अधिनियम, 2008 से जुड़ा है। इस कानून के तहत मान्यता प्राप्त मदरसों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक वैधानिक आयोग बनाया गया था।
साल 2014 में कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। बाद में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी उस फैसले को बरकरार रखा। मामला इसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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2015 से 2020 की नियुक्तियां विवाद में कैसे आईं?
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 2020 में शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए 2008 के कानून को वैध घोषित कर दिया।
हालांकि 2015 से 2020 के बीच, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, सहायता प्राप्त मदरसों में लगातार शिक्षक और गैर-शिक्षक कर्मचारियों की नियुक्तियां होती रहीं। बाद में इन्हीं नियुक्तियों की वैधता को चुनौती देते हुए नई याचिकाएं दाखिल की गईं।
2023 में बनी समिति ने क्या रिपोर्ट दी थी?
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2023 में एक समिति गठित कर 2015 से 2020 के बीच हुई नियुक्तियों की जांच कराई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि संबंधित अवधि में हुई नियुक्तियां वैध नहीं हैं।
इसी रिपोर्ट को चुनौती देते हुए 361 आवेदकों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब शीर्ष अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि 13 चयनित मामलों में भी कोई ऐसा आधार नहीं मिला, जिससे अन्य 348 आवेदकों की याचिकाओं पर अलग से सुनवाई की जाए।
