SIR विवाद के बीच राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस, बोले- वोट खत्म हुआ तो संविधान की ताकत भी खत्म होगी
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस
Rahul Gandhi Press Conference: नई दिल्ली में कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव आयोग के भीतर SIR को लेकर सामने आई आपत्तियों के बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने भाजपा की लगातार चुनावी जीत, एंटी-इन्कंबेंसी और मतदाताओं के वोट की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए। राहुल गांधी ने कहा कि भारत में एंटी-इन्कंबेंसी एक ऐसा राजनीतिक बल है, जो समय के साथ किसी भी सरकार के खिलाफ खड़ा हो जाता है। उनके मुताबिक, इससे कोई सरकार लंबे समय तक नहीं बचती। राहुल गांधी ने कहा कि इंदिरा गांधी बांग्लादेश युद्ध जीतने के बाद लोकप्रियता के चरम पर थीं, लेकिन दो-तीन साल के भीतर ही उनके खिलाफ एंटी-इन्कंबेंसी पैदा हो गई। उन्होंने कहा कि ऐसा कई कांग्रेस प्रधानमंत्रियों के साथ भी हुआ, लेकिन आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत भाजपा के नेताओं के खिलाफ वैसी एंटी-इन्कंबेंसी दिखाई नहीं देती।
राहुल ने हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात का जिक्र करते हुए कहा कि इन राज्यों में भी एंटी-इन्कंबेंसी खत्म होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि पहले उन्हें यह समझ नहीं आता था कि एंटी-इन्कंबेंसी कैसे खत्म हो रही है, लेकिन फिर उन्हें इराक और उत्तर कोरिया का उदाहरण समझ में आता है। राहुल गांधी ने कहा, “जहां लोकतंत्र नहीं होता, वहां एंटी-इन्कंबेंसी नहीं होती है।” यह राहुल गांधी का राजनीतिक दावा है। इसे उन्होंने मौजूदा चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर अपनी दलील के हिस्से के रूप में रखा।
राहुल बोले- वोट खत्म हुआ तो संविधान की ताकत भी खत्म हो सकती है
राहुल गांधी ने अपने भाषण में वोट को संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की बुनियाद से जोड़ा। उन्होंने कहा कि अगर वोट को खत्म कर दिया जाए तो संविधान अपनी ताकत खो सकता है और उसके आधार पर बने कानूनों की वैधता पर भी असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “अगर आप वोट को खत्म कर दें तो हमारा संविधान भी तबाह हो सकता है। उसे अपनी ताकत नहीं मिलती, वह कार्य नहीं कर सकता।” राहुल गांधी ने आगे कहा कि संविधान कमजोर होने पर कानून और संस्थानों पर भी असर पड़ेगा। उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग की जिम्मेदारी लोगों के वोट को सुरक्षित करना है। उनके मुताबिक, वह लंबे समय से वोट से जुड़ी समस्या की बात कर रहे हैं। इस बयान को उन्होंने SIR और चुनाव आयोग के भीतर सामने आई आपत्तियों से जोड़कर रखा।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में 10 महीने में 14 आपत्तियों का दावा
राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे समय हुई है जब चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ये आपत्तियां SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने से जुड़े आदेशों के खिलाफ अपील और वोटर डेटा की सुरक्षा जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह सवाल उठाया कि फैसलों की जानकारी या उनकी मंजूरी पहले नहीं ली गई।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी डेटा और उसके प्रबंधन में बढ़ते केंद्रीकरण पर भी चिंता जताई। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले Electoral Registration Officers यानी EROs की भूमिका और केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर के जरिए वोटर डेटा तक पहुंच को लेकर सवाल उठाए। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मामलों में दोनों आयुक्तों ने अपनी आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजीं। बाद में दोनों ने काम के बंटवारे और चुनावी रोल के IT सिस्टम से जुड़े मुद्दों पर कैबिनेट सचिव के सामने भी अपनी चिंताएं रखीं।
Form-6 में SIR से जुड़ा सवाल जोड़ने पर भी आपत्ति
विवाद का एक बड़ा हिस्सा नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form-6 से जुड़ा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस फॉर्म में SIR से संबंधित एक नया सवाल जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से पूछा जा रहा था कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि Form-6 एक वैधानिक फॉर्म है और इसे बदलने के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन की जरूरत होगी।
रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू ने भी जोशी की आपत्ति से सहमति जताई। बाद में संधू ने इस बदलाव को “अनधिकृत” और “गैरकानूनी” बताते हुए इसे हटाने की मांग की। इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि Form-6 में जोड़े गए सवाल का जवाब दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ रहा था, भले ही उस सेक्शन को अनिवार्य के तौर पर चिह्नित नहीं किया गया था। यह विवाद नए मतदाताओं के लिए सीधे तौर पर अहम है, क्योंकि Form-6 के जरिए पहली बार मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का आवेदन किया जाता है। इसलिए इस फॉर्म में किसी अतिरिक्त जानकारी की मांग का असर उन नागरिकों पर पड़ सकता है जो पहली बार वोटर के तौर पर पंजीकरण करा रहे हैं।
चुनाव आयोग ने कहा- आयोग बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है
चुनाव आयोग ने सामने आए आरोपों को खारिज किया है। आयोग ने कहा कि वह संविधान के तहत काम करने वाली बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके भीतर लिखित टिप्पणियां, सुझाव, तकनीकी राय और आंतरिक जांच-पड़ताल निर्णय लेने की प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक, उसकी सभी कार्रवाइयां कानून और आयोग के निर्देशों के अनुसार की गई हैं। आयोग ने यह भी कहा कि रिपोर्ट में आयोग के भीतर की प्रक्रिया की पूरी तस्वीर सामने नहीं आई है।
इसी विवाद के बीच एक अन्य रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज होने के बावजूद तीनों चुनाव आयुक्तों ने कई मौकों पर संयुक्त रूप से आयोग का पक्ष रखा और सार्वजनिक ब्रीफिंग में साथ दिखाई दिए। India Today के मुताबिक, 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच आयोग ने चार संयुक्त ब्रीफिंग कीं और एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित किया। इससे विवाद का केंद्र केवल SIR की प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, बहु-सदस्यीय संस्था में असहमति दर्ज करने की व्यवस्था और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे सवाल भी चर्चा में आ गए हैं।
राहुल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले एक्स पर क्या लिखा था
प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा था, “संविधान के दुश्मनों का पर्दाफाश हो गया है। न्याय जरूर होगा।” उन्होंने पोस्ट में यह भी बताया था कि वह शाम चार बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसी मुद्दे को वोट, संविधान और चुनाव आयोग की भूमिका से जोड़ते हुए अपनी बात रखी। दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने आंतरिक टिप्पणियों और आपत्तियों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। फिलहाल विवाद का एक प्रमुख हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों पर किस तरह विचार हुआ, Form-6 में SIR से जुड़ा सवाल किस प्रक्रिया के तहत जोड़ा गया और चुनावी डेटा के संचालन में केंद्र तथा जमीनी स्तर के अधिकारियों की भूमिकाएं कैसे तय की गईं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने इन सवालों को उठाया है, जबकि चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में उठाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया है।
