Chandigarh Digital Arrest Fraud: डिजिटल अरेस्ट के नाम पर बुजुर्ग महिला को गिरफ्तारी और दस साल की सजा का डर दिखाकर 47.80 लाख रुपये ठगने के मामले में साइबर क्राइम पुलिस ने ठगी के नेटवर्क की एक अहम कड़ी पकड़ ली है। पुलिस ने रांची से एक कारोबारी को गिरफ्तार किया है, जो कमीशन के बदले साइबर ठगों को अपनी कंपनी का बैंक खाता उपलब्ध कराता था। जांच में पता चला है कि उसकी कंपनी के खाते में अलग-अलग साइबर ठगी से जुड़ी करीब चार करोड़ रुपये की रकम आई थी। अब पुलिस इस रकम के लेन-देन और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पड़ताल कर रही है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान झारखंड निवासी 43 वर्षीय पवन अन्वेषी के रूप में हुई है। वह स्पार्कलर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का प्रोपराइटर है। चंडीगढ़ साइबर क्राइम थाने में 30 सितंबर को दर्ज मामले की जांच के दौरान उसका नाम सामने आया। पुलिस ने 27 अक्टूबर को उसे रांची से गिरफ्तार किया। दो दिन के पुलिस रिमांड के बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
मामले की शुरुआत 16 सितंबर को हुई, जब चंडीगढ़ की एक बुजुर्ग महिला के व्हाट्सऐप पर वॉयस और वीडियो कॉल आई। कॉल करने वालों ने खुद को चंडीगढ़ पुलिस का अधिकारी बताया। उन्होंने महिला को बताया कि उसके नाम पर जम्मू-कश्मीर में सिम कार्ड जारी हुआ है, जिसका इस्तेमाल हवाला और आतंकी फंडिंग में किया गया है। ठगों ने मामले में एटीएस और एनआईए की जांच का हवाला देकर महिला को बुरी तरह डरा दिया। ठगों ने महिला को गिरफ्तारी और दस साल की कठोर कैद की धमकी दी। भरोसा जमाने और डर बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश तक दिखाए। उसे बच्चों और परिवार के किसी सदस्य को इसकी जानकारी नहीं देने को कहा गया। 16 से 27 सितंबर तक महिला को लगातार वीडियो कॉल पर रखकर तथाकथित जांच के नाम पर मानसिक दबाव बनाया गया। इस दौरान अलग-अलग बैंक खातों में उससे 47.80 लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।
पुलिस की जांच में सामने आया कि पवन अपनी कंपनी का बैंक खाता साइबर ठगों को उपलब्ध कराता था। ठगी से हासिल रकम पहले इस खाते में मंगवाई जाती और फिर दूसरे खातों में भेज दी जाती थी। इसके बदले उसे कमीशन मिलता था। जांच में कंपनी के खाते में करीब चार करोड़ रुपये की साइबर ठगी से जुड़ी रकम आने की जानकारी मिली है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इस रकम को किन-किन खातों में भेजा गया और ठगी के मुख्य आरोपी कौन हैं। साइबर क्राइम पुलिस ने लोगों को आगाह किया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी, सीबीआई, एनआईए या अदालत व्हाट्सऐप अथवा वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती। न ही जांच या वेरिफिकेशन के नाम पर किसी से पैसे मांगे जाते हैं। ऐसी ठगी होने पर तुरंत साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत करें।
डिजिटल अरेस्ट के पीछे म्यूल अकाउंट का खेल
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों से लाखों-करोड़ों रुपये ठगने वाले साइबर गिरोह के पीछे बैंक खातों का संगठित नेटवर्क भी काम कर रहा है। चंडीगढ़ साइबर क्राइम पुलिस की जांच में खुलासा हुआ है कि ठग कमीशन का लालच देकर कारोबारियों के कंपनी खाते इस्तेमाल करते हैं और ठगी की रकम उनमें मंगवाकर आगे दूसरे खातों में भेज देते हैं। 47.80 लाख रुपये की डिजिटल अरेस्ट ठगी के मामले में रांची से गिरफ्तार कारोबारी की कंपनी के बैंक ऑफ इंडिया खाते में 35,00,047 रुपये ट्रांसफर हुए थे। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि कंपनी घाटे में चल रही थी। इसी दौरान नागपुर के एक व्यक्ति के संपर्क में आने पर वह साइबर ठगी करने वाले गिरोह से जुड़ गया। बाद में नोएडा के एक होटल में उसने आरोपियों को अपना मोबाइल, लैपटॉप, सिम कार्ड और कंपनी के बैंक खाते का एक्सेस सौंप दिया। पुलिस के मुताबिक, 22 सितंबर से आरोपी की कंपनी के खाते में करीब चार करोड़ रुपये की ठगी की रकम आई। पुलिस ने उसके कब्जे से मोबाइल, लैपटॉप और खाते की चेकबुक बरामद की है। ऐसे खातों को साइबर अपराध की भाषा में म्यूल अकाउंट कहा जाता है। इनके जरिए ठगी की रकम को कई खातों में घुमाकर असली स्रोत और लाभार्थी की पहचान छिपाई जाती है। पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों और पैसों के लेन-देन की जांच कर रही है।

