Couple Spiritual Life: भागदौड़ भरी शहरी जिंदगी, लाखों का पैकेज और सुख-सुविधाओं से लैस जीवन… हर कोई आज इसी अंधी दौड़ का हिस्सा बनने में जुटा है। लेकिन मध्यप्रदेश के सीहोर जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो मन को सुकून देने के साथ-साथ जिंदगी के असली मायनों को नए सिरे से समझाती है। यहां एक इंजीनियर दंपति ने अपनी मोटी कमाई वाली नौकरी और कॉर्पोरेट लाइफ को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। यह दंपति अब मां नर्मदा के पावन तट पर एक छोटी सी कुटिया में रहकर परिक्रमा करने वाले भक्तों की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर चुका है।
11 मुखी हनुमान मंदिर के पास बनाया आशियाना, रोजाना 50-60 परिक्रमावासियों को करा रहे भोजन
सीहोर जिले की रहटी तहसील अंतर्गत जाजना और मट्ठा गांव के बीच उत्तर तट पर 11 मुखी हनुमान जी का एक प्राचीन मंदिर व आश्रम स्थित है। यह स्थान मां नर्मदा के प्रसिद्ध परिक्रमा मार्ग पर आता है। इसी आश्रम के पास एक हजार साल पुराने विशाल बरगद के पेड़ की छांव में दंपति ने अपनी कुटिया बनाई है। यहां अमर दास बाबा और उनकी एमटेक पास पत्नी रोजाना 50 से 60 नर्मदा परिक्रमावासियों को दोनों वक्त श्रद्धा और प्यार से भोजन प्रसादी कराते हैं। दंपति इस सेवा को मां नर्मदा का ही चमत्कार और आशीर्वाद मानता है।
कोरोना काल की परिक्रमा ने बदला जीवन, हिमालय जाने का ख्याल छोड़ चुनी नर्मदा सेवा
अमर दास बाबा ने अपने इस फैसले के पीछे की वजह साझा करते हुए बताया कि उनके आध्यात्मिक गुरु भय्यू महाराज थे। शुरुआत में वे आध्यात्मिक शांति के लिए हिमालय जाकर तपस्या करना चाहते थे, लेकिन दोस्तों की सलाह पर कोरोना काल के दौरान उन्होंने मां नर्मदा की परिक्रमा शुरू की। परिक्रमा के दौरान जगह-जगह ग्रामीणों द्वारा मिले निस्वार्थ प्रेम, फल-फूल और भोजन ने उनके दिल को छू लिया। वहीं से उनके मन में ख्याल आया कि जब लोग उनकी सेवा कर रहे हैं, तो वे खुद क्यों न परिक्रमावासियों की सेवा करें।
3500 किमी की कठिन परिक्रमा में परोपकार की मिसाल, शहर की भागदौड़ से दूर पाया सच्चा सुकून
मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर खंभात की खाड़ी में मिलने वाली मां नर्मदा देश की एकमात्र ऐसी नदी हैं जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। लगभग 2,600 से 3,500 किलोमीटर लंबी इस कठिन परिक्रमा यात्रा में लाखों श्रद्धालु पैदल चलते हैं। ऐसे में एकांत तट पर इस इंजीनियर दंपति द्वारा दी जा रही निशुल्क भोजन सेवा परिक्रमावासियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। दंपति का कहना है कि जो चैन और आत्मिक शांति उन्हें नर्मदा जी के शांत किनारे पर निस्वार्थ सेवा करके मिल रही है, वह शहरों की करोड़ों की चमक-धमक में भी नहीं थी।
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