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Father shayari : मां जैसा दुलार और बरगद सी छांव, सोशल मीडिया पर वायरल हुए पिता पर लिखे ये चुनिंदा शेर

Father shayari : मां जैसा दुलार और बरगद सी छांव, सोशल मीडिया पर वायरल हुए पिता पर लिखे ये चुनिंदा शेर

Father shayari : मां जैसा दुलार और बरगद सी छांव, सोशल मीडिया पर वायरल हुए पिता पर लिखे ये चुनिंदा शेर

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Father shayari in Hindi 2026 : सपनों को उड़ान देने के लिए खुद को झोंक देने वाले पिता की अहमियत अक्सर तब पता चलती है जब इंसान जिंदगी की तपती धूप में एकदम अकेला खड़ा होता है। मां की तरह अपनी मोहब्बत का ढिंढोरा न पीटने वाले पिता की हर डांट के पीछे बच्चों के सुनहरे भविष्य की अनगिनत मन्नतें और दुआएं दफन होती हैं। पिताओं के इसी गहरे और अनकहे त्याग पर देश-दुनिया के नामचीन शायरों ने बेहद रूहानी पंक्तियां लिखी हैं। टूट जाएगा हर घमंड। ये शेर पिता के प्रेम और समर्पण के हर छिपे हुए जख्म को कुरेदकर सीधे कागज पर उतार देते हैं।

बेबसी और बुढ़ापे की चुभती दास्तान

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मुईन शादाब ने बदलते दौर के पारिवारिक ताने-बाने पर गहरा वार करते हुए लिखा है कि वो वक़्त और थे कि बुज़ुर्गों की क़द्र थी, अब एक बूढ़ा बाप भरे घर पे बार है। अज्ञात शायर की कलम चीख उठी कि इन का उठना नहीं है हश्र से कम, घर की दीवार बाप का साया। रऊफ़ ख़ैर ने नौजवान बेटों की निकम्मेपन पर तीखा हमला बोलते हुए लिखा कि हड्डियां बाप की गूदे से हुई हैं ख़ाली, कम से कम अब तो ये बेटे भी कमाने लग जाएँ।

Father shayari – Papa shayari in Hindi

मुद्दत के बाद ख़्वाब में आया था मेरा बाप
और उस ने मुझ से इतना कहा ख़ुश रहा करो
– अब्बास ताबिश

बाप ज़ीना है जो ले जाता है ऊंचाई तक
माँ दुआ है जो सदा साया-फ़िगन रहती है
– सरफ़राज़ नवाज़

देर से आने पर वो ख़फ़ा था आख़िर मान गया
आज मैं अपने बाप से मिलने क़ब्रिस्तान गया
– अफ़ज़ल ख़ान

बच्चे मेरी उंगली थामे धीरे धीरे चलते थे
फिर वो आगे दौड़ गए मैं तन्हा पीछे छूट गया
– ख़ालिद महमूद

जब भी वालिद की जफ़ा याद आई
अपने दादा की ख़ता याद आई
– मोहम्मद यूसुफ़ पापा

वो पेड़ जिस की छांव में कटी थी उम्र गांव में
मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं
– हम्माद नियाज़ी

मेरा भी एक बाप था अच्छा सा एक बाप
वो जिस जगह पहुँच के मरा था वहीं हूँ मैं
– रईस फ़रोग़

शकील जमाली की पंक्तियां दिल को चीर देती हैं जहां वे लिखते हैं कि मैं ने हाथों से बुझाई है दहकती हुई आग, अपने बच्चे के खिलौने को बचाने के लिए। हम्माद नियाज़ी पिता की नजदीकी को बेहद सादगी से पेश करते हुए लिखते हैं कि सुबह सवेरे नंगे पांव घास पे चलना ऐसा है, जैसे बाप का पहला बोसा क़ुर्बत जैसे माओं की। नियाज़ी आगे लिखते हैं कि मैं अपने बाप के सीने से फूल चुनता हूं, सो जब भी सांस थमी बाग़ में टहल आया।

जिम्मेदारी का पहाड़ और टूटते ख्वाब

मेराज फ़ैज़ाबादी ने जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे पिता की हिम्मत को इन शब्दों में पिरोया है कि मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़, मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते। ताहिर शहीर मां से तुलना करते हुए लिखते हैं कि अज़ीज़-तर मुझे रखता है वो रग-ए-जाँ से, ये बात सच है मिरा बाप कम नहीं माँ से। एक और अज्ञात शेर घर की मजबूती को दर्शाता है कि उन के होने से बख़्त होते हैं, बाप घर के दरख़्त होते हैं।

इफ़्तिख़ार आरिफ़ बेटियों और पिता के रिश्ते पर लिखते हैं कि बेटियां बाप की आँखों में छुपे ख़्वाब को पहचानती हैं, और कोई दूसरा इस ख़्वाब को पढ़ ले तो बुरा मानती हैं। मेराज फ़ैज़ाबादी ने झुर्रियों को सबसे बड़ी सीख बताते हुए लिखा कि हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब, पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने।

यादों के साए और कब्रिस्तानों का सन्नाटा

मुनव्वर राना की अमर पंक्तियां भविष्य की पीढ़ी को संस्कार सिखाती हैं कि ये सोच के मां बाप की ख़िदमत में लगा हूं, इस पेड़ का साया मिरे बच्चों को मिलेगा। अज्ञात शायर लिखता है कि मुझ को छांव में रखा और ख़ुद भी वो जलता रहा, मैं ने देखा इक फ़रिश्ता बाप की परछाईं में। साजिद जावेद साजिद घर के उस रहस्य को ढूंढना चाहते हैं जहां गम छुपाए जाते थे, वे लिखते हैं कि घर की इस बार मुकम्मल मैं तलाशी लूंगा, ग़म छुपा कर मिरे मां बाप कहां रखते थे।

अब्बास ताबिश की यादों का कारवां कुछ यूं चलता है कि मुद्दत के बाद ख़्वाब में आया था मेरा बाप, और उस ने मुझ से इतना कहा ख़ुश रहा करो। सरफ़राज़ नवाज़ कहते हैं कि बाप ज़ीना है जो ले जाता है ऊंचाई तक, माँ दुआ है जो सदा साया-फ़िगन रहती है। अफ़ज़ल ख़ान की पंक्तियां आंखें नम कर देती हैं कि देर से आने पर वो ख़फ़ा था आख़िर मान गया, आज मैं अपने बाप से मिलने क़ब्रिस्तान गया।

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ख़ालिद महमूद बच्चों के आगे निकल जाने के दर्द को बयां करते हुए लिखते हैं कि बच्चे मेरी उंगली थामे धीरे धीरे चलते थे, फिर वो आगे दौड़ गए मैं तन्हा पीछे छूट गया। मोहम्मद यूसुफ़ पापा लिखते हैं कि जब भी वालिद की जफ़ा याद आई, अपने दादा की ख़ता याद आई। हम्माद नियाज़ी गांव के उस पुराने साए को याद करते हैं कि वो पेड़ जिस की छांव में कटी थी उम्र गांव में, मैं चूम चूम थक गया मगर ये दिल भरा नहीं। रईस फ़रोग़ अंत में एक कड़वी हकीकत बयां करते हैं कि मेरा भी एक बाप था अच्छा सा एक बाप, वो जिस जगह पहुँच के मरा था वहीं हूँ मैं।

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