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Haryana Day History 1966: फजल अली आयोग ने कर दिया था खारिज, जानिए कैसे मिला हरियाणा को अलग राज्य का दर्जा

 Haryana Day History 1966: फजल अली आयोग ने कर दिया था खारिज, जानिए कैसे मिला हरियाणा को अलग राज्य का दर्जा

फजल अली आयोग ने कर दिया था खारिज, जानिए कैसे मिला हरियाणा को अलग राज्य का दर्जा

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AAmandeep Singh

Haryana Day History 1966: हरियाणा भले ही 1 नवंबर 1966 को प्रशासनिक तौर पर देश का 17वां राज्य बना, लेकिन इसका अस्तित्व सदियों पुराना है। ‘हरियाणा’ शब्द की उत्पत्ति ‘हरि’ और ‘आना’ के मेल से हुई है, जिसका अर्थ है भगवान का आगमन। मनुस्मृति, महाभाष्य, वशिष्ठ धर्मसूत्र और विनय पिटक जैसे प्राचीन ग्रंथों में इस भूभाग का विस्तृत उल्लेख मिलता है। कुरुक्षेत्र की यही पावन धारा है जहां महाभारत का धर्मयुद्ध लड़ा गया और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का निष्काम कर्म संदेश दिया, जो आज भी संपूर्ण मानवता को जीवन जीने की राह दिखाता है।

आजादी से पहले उठी मांग और शुरुआती अड़चनें

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अलग राज्य के रूप में हरियाणा की मांग आजादी से पहले ही उठने लगी थी। हालांकि, 1930 के दशक में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन पर सहमत रहने वाले महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल आजादी के बाद अलगाववादी प्रवृत्तियों के भय से इसके विरोध में आ गए। आजादी के तुरंत बाद गठित जेवीपी कमेटी (जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, पट्टाभि सीतारमैया) ने स्पष्ट किया कि इस समय देश की अखंडता और विकास प्राथमिकता है, इसलिए भाषा के आधार पर राज्यों का बंटवारा नहीं हो सकता।

इसके बाद 1953 में बने फजल अली आयोग (राज्य पुनर्गठन आयोग) ने भी अलग हरियाणा के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि नए राज्य के पास विकास के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे। इस बीच संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर का ‘सच्चर फार्मूला’ भी जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर सका।

देवी लाल का तेवर और कैरों का सियासी गतिरोध

आंदोलन को असली ताकत तब मिली जब चौधरी देवी लाल और प्रोफेसर शेर सिंह ने इसकी कमान संभाली। जब फजल अली आयोग की रिपोर्ट ने हरियाणा के दावे को नकारा, तो चौधरी देवी लाल ने संयुक्त पंजाब की विधानसभा में खुलकर हरियाणवी बोली में बोलना शुरू कर दिया। जब अन्य सदस्यों ने इस पर आपत्ति जताई, तो देवी लाल का दोटूक जवाब था कि उनके क्षेत्र की जनता यही भाषा समझती है।

दूसरी ओर, तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों पंजाब के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने अंबाला और कुरुक्षेत्र में बाहर से लाकर लोगों को बसाने के फैसले किए, जिससे स्थानीय असंतोष और भड़क गया। दिलचस्प बात यह रही कि हरियाणा के ही कुछ कद्दावर नेता—जैसे राव बीरेंद्र सिंह और भगवत दयाल शर्मा—उस समय अलग राज्य के गठन के विरोध में खड़े थे, हालांकि बाद में दोनों ने हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की बागडोर संभाली।

शाह आयोग की रिपोर्ट और 1 नवंबर 1966 का नया सूर्योदय

1960 के दशक में अलग पंजाब और अलग हरियाणा का आंदोलन चरम पर पहुंच गया। 1965 में संत फतेह सिंह के अनशन और आत्मदाह की चेतावनी के बाद केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा। 1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने पुनर्गठन को हरी झंडी दी। 23 अप्रैल 1966 को न्यायमूर्ति जे.सी. शाह की अध्यक्षता में सीमा आयोग का गठन किया गया।

शाह आयोग की सिफारिशों के आधार पर 3 सितंबर 1966 को तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने लोकसभा में ‘पंजाब पुनर्गठन विधेयक’ पेश किया। विधेयक में प्रावधान किया गया कि चंडीगढ़ दोनों राज्यों की साझा राजधानी रहेगी, जबकि हाईकोर्ट और बिजली बोर्ड जैसी संस्थाएं साझी होंगी। 7 सितंबर को यह बिल संसद से पारित हुआ और 18 सितंबर 1966 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलते ही 1 नवंबर 1966 को हरियाणा एक स्वतंत्र राज्य के रूप में नक्शे पर उभर आया।

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