Narnaul: सांस्कृतिक अहीरवाल की सीहमा खंड स्तरीय विचार गोष्ठी में अहीरवाल की ऐतिहासिक विरासत, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने पर हुआ मंथन
सीहमा (महेंद्रगढ़)। अहीरवाल की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत, प्राचीन संस्कृति, सामाजिक परंपराओं और पूर्वजों के योगदान को संरक्षित करने के उद्देश्य से सांस्कृतिक अहीरवाल, महेंद्रगढ़ की ओर से सीहमा खंड स्तर पर प्रबुद्ध नागरिक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। ‘अहीरवाल संस्कृति—विरासत की सुरक्षा’ विषय पर आयोजित इस गोष्ठी में क्षेत्र के इतिहास, सांस्कृतिक पहचान और भावी पीढ़ियों तक अपनी विरासत पहुंचाने की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता केंद्रीय विश्वविद्यालय, पाली की प्रोफेसर डॉ. नीलम यादव रहीं, जबकि अध्यक्षता सांस्कृतिक अहीरवाल के निदेशक सत्यव्रत शास्त्री ने की। सीहमा खंड के संयोजक मास्टर धर्मपाल गुलावला ने गोष्ठी में पहुंचे सभी अतिथियों एवं प्रबुद्ध नागरिकों का स्वागत किया।
गोष्ठी की मुख्य वक्ता डॉ. नीलम यादव ने अहीरवाल की सांस्कृतिक विरासत पर विचार रखते हुए कहा कि अहीरवाल की संस्कृति सामाजिक समरसता, त्याग, तपस्या, साधना और सामूहिक जीवन मूल्यों की संस्कृति रही है। क्षेत्र के पूर्वजों ने अपने कठोर परिश्रम, त्याग और संघर्ष के बल पर अनेक चुनौतियों का सामना किया तथा समाज को गौरवशाली परंपराएं प्रदान कीं।
उन्होंने कहा कि अपने पूर्वजों के योगदान के प्रति उदासीनता समाज को कमजोर बनाती है। जब किसी समाज को अपने इतिहास, महापुरुषों और पूर्वजों के कार्यों की जानकारी होती है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास और गौरव की भावना विकसित होती है। इतिहास पर निरंतर चिंतन-मनन करने से समाज अपनी उपलब्धियों को समझता है और उनसे प्रेरणा लेकर भविष्य की दिशा तय करता है।
डॉ. यादव ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश अहीरवाल क्षेत्र के लोगों का एक वर्ग अपनी ऐतिहासिक उपलब्धियों और सांस्कृतिक परंपराओं को सामने रखने से कतराने लगा है। कई बार इसे आत्मप्रशंसा समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि अपने इतिहास को जानना और उसका सम्मान करना किसी भी समाज की पहचान को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सांस्कृतिक अहीरवाल के निदेशक सत्यव्रत शास्त्री ने कहा कि दुनिया में यह मान्यता प्रचलित है कि किसी क्षेत्र, समुदाय या देश की पहचान को समाप्त करना हो तो उसके इतिहास को मिटा दिया जाए। उन्होंने कहा कि अहीरवाल के इतिहास के साथ भी विकृति और उपेक्षा की समस्या रही है, जिसके कारण नई पीढ़ी अपने क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक उपलब्धियों से अपेक्षित रूप से परिचित नहीं हो पाई।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि अहीरवाल के लोग अपनी ऐतिहासिक पहचान को समझें और गर्व के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ें। जब व्यक्ति को अपने पूर्वजों के संघर्ष, उपलब्धियों और समाज के निर्माण में उनके योगदान का ज्ञान होगा, तभी उसके भीतर अपनी विरासत के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी की भावना पैदा होगी।
उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल अतीत का स्मरण करना नहीं है, बल्कि उससे प्रेरणा लेकर वर्तमान समाज को मजबूत बनाना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सांस्कृतिक आधार तैयार करना भी है।
सत्यव्रत शास्त्री ने सांस्कृतिक अहीरवाल की ओर से किए जा रहे ऐतिहासिक कार्यों की जानकारी देते हुए बताया कि अहीरवाल के लगभग ढाई हजार गांवों के इतिहास के संकलन का कार्य पूरा हो चुका है। राजस्थान क्षेत्र से संबंधित इतिहास के प्रकाशन का कार्य पूर्ण हो गया है, जबकि हरियाणा क्षेत्र के इतिहास के प्रकाशन की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में हरियाणा क्षेत्र से संबंधित इतिहास का प्रकाशन भी पूरा कर लिया जाएगा, जिससे अहीरवाल की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को व्यवस्थित रूप से समाज के सामने प्रस्तुत किया जा सकेगा।
उन्होंने कहा कि यदि घरों में बच्चों को अपने पूर्वजों की जीवनशैली, लोक परंपराओं, पारंपरिक खेलों और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के बारे में बताया जाएगा, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी। इससे हमारी सांस्कृतिक विरासत केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जीवंत सामाजिक परंपरा के रूप में आगे बढ़ेगी।
उन्होंने कहा कि अपनी संस्कृति को जीवन में महत्व देना, पूर्वजों के योगदान को सम्मानपूर्वक याद करना और उस विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता है।
विचार गोष्ठी में मास्टर महेश यादव, विनोद आर्य, धर्मपाल यादव, एडवोकेट हेमंत शर्मा, सांवत सिंह और ओमप्रकाश यादव जाखनी सहित अन्य वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
वक्ताओं ने कहा कि क्षेत्र के इतिहास और परंपराओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए इस प्रकार की विचार गोष्ठियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इनके माध्यम से न केवल ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा होती है, बल्कि समाज को अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारियों का भी एहसास होता है। कार्यक्रम का संचालन जिला संयोजक सतीश यादव ने किया।
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