ATM Card: आज हमें आधी रात को भी नकदी की जरूरत होती है, तो हम बिना सोचे नजदीकी एटीएम का रुख कर लेते हैं। लेकिन जरा सोचिए कि आज से छह दशक पहले का जीवन कैसा रहा होगा, जब पैसे निकालने का एकमात्र जरिया सिर्फ बैंक की शाखाएं थीं। सप्ताहांत (शनिवार-रविवार) या सरकारी छुट्टियों के दौरान अगर कोई मेडिकल इमरजेंसी आ जाए, तो लोग पूरी तरह बेबस हो जाते थे। इसी लाचारी ने बैंकिंग इतिहास के सबसे बड़े बदलाव को जन्म दिया। स्कॉटलैंड के रहने वाले जॉन शेफर्ड-बैरोन एक दिन महज कुछ मिनट की देरी से बैंक पहुंचे और बैंक का मुख्य दरवाजा बंद हो गया। उस रात पैसों की किल्लत से जूझते हुए उन्होंने सोचा कि जब वेंडिंग मशीन से हर समय चॉकलेट निकल सकती है, तो पैसे देने वाली ऐसी कोई मशीन क्यों नहीं हो सकती?
लंदन से हुई शुरुआत, चेक से निकलते थे पैसे
जॉन शेफर्ड-बैरोन ने अपने इस अनूठे विचार पर काम शुरू किया और एक ऐसी ऑटोमेटेड मशीन का खाका खींचा जो इंसानी क्लर्क की जगह ले सके। उनके इस प्रयास को बार्कलेज बैंक का साथ मिला और 27 जून 1967 को लंदन की एक शाखा में दुनिया का पहला एटीएम (Automated Teller Machine) स्थापित किया गया। दिलचस्प बात यह है कि उस जमाने में आज की तरह प्लास्टिक के मैग्नेटिक कार्ड नहीं हुआ करते थे। ग्राहकों को बैंक से एक खास तरह का केमिकल युक्त पेपर वाउचर या चेक मिलता था। इस वाउचर को मशीन में डालने के बाद ही कैश बाहर आता था। समय के साथ तकनीक बदली और पेपर वाउचर की जगह प्लास्टिक कार्ड्स ने ले ली।
सुरक्षा का गणितीय फॉर्मूला: ‘लूह्न एल्गोरिदम’कार्ड का सबसे आखिरी यानी 16वां अंक एक विशेष सुरक्षा तकनीक के तहत तय किया जाता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में लूह्न एल्गोरिदम ($Luhn\ Algorithm$) कहा जाता है। यह एक जटिल गणितीय फॉर्मूला है। जब भी आप ऑनलाइन शॉपिंग या स्वाइप मशीन पर कार्ड नंबर दर्ज करते हैं, तो यह एल्गोरिदम पीछे बैकएंड में काम करता है। अगर आपने गलती से एक भी नंबर गलत टाइप कर दिया, तो यह चेक डिजिट पूरे फॉर्मूले को अमान्य कर देता है, जिससे फर्जीवाड़ा या गलत ट्रांजैक्शन उसी वक्त रुक जाता है।बैंकिंग का आधुनिक चेहरा: आज एटीएम सिर्फ नकदी निकालने तक सीमित नहीं रह गया है। 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली इस तकनीक ने मिनी स्टेटमेंट, फंड ट्रांसफर, पिन चेंज और कैश डिपॉजिट जैसी कई जटिल बैंकिंग प्रक्रियाओं को सीधे आम जनता की उंगलियों पर लाकर खड़ा कर दिया है।

